जीवित्पुत्रिका: संतान की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत, प्रदोषकाल में पूजा, चार अक्तूबर को सुबह 7:28 बजे पारण
संतान की लंबी उम्र के लिए महिलाएं तीन अक्तूबर को जीवित्पुत्रिका का निर्जला रखेंगी। प्रदोषकाल में पूजा करेंगी। वहीं चार अक्तूबर की सुबह 07:28 बजे से पारण करेंगी। लक्ष्मीकुंड पर जिउतिया पूजन के लिए मेला लगेगा।
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संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना के लिए माताओं का तीन दिवसीय जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत दो अक्तूबर को नहाय खाय के साथ शुरू हो जाएगा। तीन अक्तूबर को वह निराजल व्रत रखेंगी। प्रदोष काल यानी शाम 06:05 बजे से मंदिरों, कुंडों व घाटों पर सविधि पूजन करेंगी। जीउतवाहन की कथा का श्रवण करेंगी। चार अक्तूबर को सुबह 07:28 बजे से पारण करेंगी। लक्ष्मीकुंड पर जिउतिया पूजन के लिए मेला लगेगा।
संतान की दीर्घायु का पर्व जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। इस बार अष्टमी तिथि तीन अक्तूबर को है। महिलाएं दिनभर निर्जला उपवास रखकर प्रदोष काल में राजा जीमूतवाहन की पूजा करेंगी। अगले दिन अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद पारण होगा।
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष प्रख्यात ज्योतिषविद् प्रो. नागेंद्र पांडेय ने बताया कि इस व्रत को खर जिउतिया भी कहते हैं। क्योंकि इसमें दिनभर निराजल व्रत रखा जाता है। इस बार अष्टमी तिथि तीन अक्तूबर को सुबह 9:53 से अगले दिन सुबह 7:27 बजे तक रहेगी। इसके बाद नवमी तिथि लग जाएगी और अगले दिन सुबह 5:50 बजे तक रहेगी। इसके बाद दशमी तिथि लग जाएगी। इस तरह से नवमी तिथि का क्षय रहेगा।
तीन अक्तूबर को अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन है। अष्टमी तिथि तीन को लगने के साथ ही जिउतिया व्रत रखा जाएगा। उन्होंने बताया कि इस दिन महिलाएं दिनभर व्रत रखकर शाम को कुंडों, तालाबों, घाटों और मंदिरों पर विविध नैवेद्य के साथ जिउतिया माता का पूजन करेंगी। रात्रि जागरण कर कथा का श्रवण और मंगल गीत गाएंगी।
लोकमान्यताओं में जिउतिया व्रत से पहले सरगी या ओठगन की परंपरा निभाई जाती है। रात में विशेष पकवान और मिष्ठान तैयार किए जाते हैं। पकवानों में से पितरों, चील, सियार, गाय और कुत्ते के लिए भी अंश निकालने की परंपरा है। व्रत में सतपुतिया की सब्जी का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा में धूप, दीप, सरसों का तेल, खली, फल-फूल और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। महिलाएं विधिवत पूजा के साथ जीमूतवाहन की कथा का श्रवण करती हैं। पारण के बाद पूजा में चढ़ाए गए सरसों के तेल को बच्चों के सिर पर आशीर्वाद स्वरूप लगाने की भी परंपरा है। कुश से राजा जीमूतवाहन की प्रतिमा तैयार कर पूजा स्थल पर स्थापित की जाती है।