बदलती पीढ़ियों के बीच बढ़ते संवादहीनता के फासले को पाटने के लिए बच्चों को दबाने या हर कदम पर रोकने के बजाय उन पर भरोसा करना होगा। बच्चों को गलती करने का अवसर देना होगा, ताकि माता-पिता के रहते वे गिरकर संभलना सीख सकें। प्रसिद्ध कथावाचक एवं आध्यात्मिक वक्ता जया किशोरी ने शनिवार को अमर उजाला और हरे कृष्ण ज्वेलर्स के संयुक्त तत्वावधान में चौकाघाट स्थित गिरिजा देवी सांस्कृतिक संकुल में आयोजित जीवांजलि कार्यक्रम में बदलते पारिवारिक रिश्तों, बच्चों की परवरिश, संस्कार, मोबाइल और भारतीय परंपराओं पर बात करते हुए यह बात कही।
काशी में जीवांजलि: आध्यात्मिक वक्ता जया बोलीं- बच्चों को गलती करने का माैका देना होगा ताकि वे संभलना सीखें
जीवांजलि कार्यक्रम में जया किशोरी ने बच्चों की परवरिश को लेकर कहा कि उन्हें दबाकर नहीं, समझदार बनाकर आगे बढ़ाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सख्ती बढ़ाने पर बच्चे झूठ बोलने लगते हैं। बच्चों को नीचा दिखाकर सीख देने के बजाय समझदार कहकर जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मां-बाप का तरीका गलत हो सकता है, लेकिन बच्चों की उन्नति का उद्देश्य गलत नहीं होता। शास्त्र जीवन जीने की पद्धति सिखाते हैं।
जया किशोरी ने कहा कि आज घर में दो पीढ़ियां हैं, माता-पिता और बच्चे। दोनों को लगता है कि उनकी पीढ़ी बेहतर समझती है। माता-पिता को लगता है कि बच्चों को उनके अनुभव की जानकारी नहीं है और बच्चों को लगता है कि उनके जमाने से बेहतर कोई जमाना नहीं। ऐसे में दोनों बात करने बैठते हैं तो कई बार बातचीत समाधान के बजाय विवाद पर खत्म हो जाती है। उन्होंने कहा कि माता-पिता और बच्चों के बीच हो या भाई-बहन के बीच, कोई भी दूरी तब तक खत्म नहीं होगी, जब तक दोनों तरफ से उसे खत्म करने की इच्छा न हो।
जया किशोरी ने अपने बचपन का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके माता-पिता जब उन्हें कोई बात समझाते थे तो यह नहीं कहते थे कि यही करो। वे स्थिति बताते और कहते, तुम समझदार हो, बाकी तुम बताओ क्या ठीक रहेगा। समझदार कहकर वे खुश कर देते थे और फिर जो निर्णय वे बताते, मैं वही करती थी।
उन्होंने कहा कि बच्चों पर हर बात के लिए दबाव बनाकर उन्हें सही नहीं बनाया जा सकता। जब माता-पिता अपने बच्चों को अपने सामने गलती करने देते हैं तो उनके पास गिरने पर उठाने का अवसर भी रहता है। यही अनुभव आगे चलकर बच्चों को सही निर्णय लेने में मदद करता है। उन्होंने कहा कि आज के बच्चे आने वाला समाज और देश हैं। इसलिए उनकी परवरिश केवल एक परिवार का नहीं, पूरे समाज के भविष्य का विषय है।
सख्ती बढ़ेगी तो झूठ बढ़ेगा
उन्होंने कहा कि माता-पिता को यह समझना होगा कि गलतियां सिर्फ बच्चे नहीं करते, उनसे भी गलतियां हुई हैं। अपना समय भूलकर बच्चों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे हर बात उसी तरह समझें, जैसे माता-पिता समझते हैं। उन्होंने चेताया कि बच्चों के प्रति जितनी अधिक सख्ती बढ़ती जाएगी, वे उतने ही अधिक झूठ बोलने लगेंगे। सीख देते समय बच्चे को नीचा दिखाना जरूरी नहीं है। सीख दीजिए, लेकिन उसकी इज्जत बचाकर। सम्मान हर व्यक्ति को अच्छा लगता है।
उन्होंने कहा कि माता-पिता के तरीके गलत हो सकते हैं, लेकिन उनके उद्देश्य गलत नहीं होते। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे उनसे अधिक सुख और बेहतर जीवन पाएं। मां-बाप से अधिक बच्चे की उन्नति चाहने वाला शायद ही कोई हो। उन्होंने कहा कि माता-पिता ने जितना बेहतर सीखा, अपनी क्षमता के अनुसार बच्चों को उससे बेहतर देने की कोशिश की, लेकिन हर चीज माता-पिता नहीं कर सकते, कुछ जिम्मेदारी बच्चों को भी उठानी होगी।
जिस गड्ढे में हम गिर चुके, उसमें मत गिरना
उन्होंने नई पीढ़ी को लेकर कहा कि बच्चों को लगता है कि वे नई सोच लेकर आए हैं, इसलिए उनकी हर बात सही होगी। लेकिन यह भी एक प्रयोग है। माता-पिता जीवन में अच्छा-बुरा दोनों देख चुके हैं। इसलिए जब वे बच्चों को किसी रास्ते पर जाने से रोकते हैं तो कई बार उनका आशय सिर्फ इतना होता है कि जिस गड्ढे में वे खुद गिर चुके हैं, उसमें बच्चे न गिरें।
संस्कार बचपन में, जब मिट्टी गीली हो
जया किशोरी ने कहा कि संस्कार देने का सही समय बचपन है। जब मिट्टी गीली होती है, तभी उसे मनचाहा आकार दिया जा सकता है। बड़े होने के बाद डर के माहौल में दिए गए संस्कार उतने स्थायी नहीं होते। बच्चे पर निगरानी इसलिए नहीं होनी चाहिए कि वह केवल माता-पिता की मौजूदगी में सही व्यवहार करे, बल्कि उसे ऐसा बनाया जाना चाहिए कि माता-पिता के सामने न होने पर भी वह सही निर्णय ले सके। बच्चों को किताबों से जोड़ने की जरूरत बताते हुए उन्होंने कहा कि एक किताब पढ़कर व्यक्ति किसी दूसरे के 20 साल के अनुभव को समझ सकता है। उन्होंने अपने बचपन का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके माता-पिता ने उन्हें शास्त्रों की बातें कहानी के रूप में समझाईं।
मोबाइल दे रहे माता-पिता, फिर मासूमियत खोने की शिकायत
उन्होंने मोबाइल को लेकर भी माता-पिता को आईना दिखाया। कहा कि आज बच्चे उम्र से पहले समझदार हो रहे हैं और इसके लिए केवल बच्चों को दोष देना ठीक नहीं है। फोन माता-पिता ही बच्चों के हाथ में दे रहे हैं, क्योंकि वे खुद अपने दोस्तों के साथ बैठे होते हैं। फोन ने बच्चों के भीतर की मासूमियत को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि बच्चों को छोटी उम्र से ही किताब, कथा, परिवार और अपनी परंपराओं से जोड़ना होगा। बच्चों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि क्या करना है, बल्कि यह भी बताना होगा कि उसके पीछे की वजह क्या है।