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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Jhulelal Jayanti worship of Jhulelal started in Kashi from 15 Sindhi families

UP: 15 परिवारों से काशी में शुरू हुई थी झूलेलाल की पूजा, देश के बंटवारे के बाद आए 700 लोगों ने दिया भव्य आकार

Wed, 10 Apr 2024 04:54 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: प्रगति चंद Updated Wed, 10 Apr 2024 04:54 PM IST
सार

काशी में 15 परिवारों से झूलेला की पूजा शुरू हुई। लेकिन देश के बंटवारे के बाद 700 सिंधी समाज के लोगों के काशी आने के बाद इस उत्सव ने भव्य आकार ले लिया। रामापुरा में सामूहिक रूप से पूजा शुरू की गई थी। 

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Jhulelal Jayanti worship of Jhulelal started in Kashi from 15 Sindhi families
झूलेलाल जंयती - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

आजादी के पहले काशी में 15 सिंधी परिवारों से काशी में झूलेलाल के अवतरण दिवस पर पूजा शुरू हुई। लेकिन, देश के बंटवारे के बाद काशी आए 700 सिंधी समाज के लोगों ने इस उत्सव को भव्य आकार दिया। 64 सालों से समाज के लोग संगठित रूप में अपने इष्टदेव की आराधना कर रहे हैं।

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चैत्र शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को झूलेलाल का अवतरण दिवस मनाया जाता है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में जन्म लेने वाले झूलेलाल को सिंधी समाज के लोग वरुण देव का स्वरूप मानते हैं। काशी में उनके अवतरण दिवस का पर्व आजादी के पहले से मनाया जाता रहा है। सिंधी समाज के जानकार रमेश लखवानी ने बताया कि आजादी के पहले करीब 15 परिवार बनारस में रहते थे। उस वक्त वे अपने घरों में ही झूलेलाल जयंती मनाते थे। मगर, बंटवारे के बाद 700 से अधिक लोगों ने काशी का रुख किया।
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सामूहिक संगठन के रूप में 1960 में पूज्य सिंधी सेंट्रल पंचायत का गठन भगत बालचंद्र मंगनानी ने किया। तब रामापुरा स्थित शंकर सत्संग भवन झूलेलाल की जयंती मनाई जाती थी और शोभायात्रा बेनियाबाग, मैदागिन, चौक होकर दशाश्वमेध घाट तक जाती थी। उन्होंने बताया कि समाज के लोगों की मदद से 1957 में लक्सा में जमीन ली गई। 
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1982 में झूलेलाल मंदिर का निर्माण शुरू हुआ, जिसका विधिवत उद्घाटन 1986 में हुआ। इसके बाद से सभी कार्यक्रम यहीं पर होते हैं। पूज्य सिंधी सेंट्रल पंचायत के अध्यक्ष ओपी बदलानी ने बताया कि यह संगठन 23 वार्डों, चार धार्मिक और चार सामाजिक संस्थाओं को मिलाकर बनाया गया है। वार्ड मुखिया छोटी-मोटी समस्याओं को निपटाने के अलावा उनके सुख-दुख में भागीदारी करते हैं।

25 साल में मंदिर के लिए जुटाए 2.50 लाख रुपये

मंदिर और धर्मशाला के लिए जमीन तो 1957 में ही ले ली गई थी। मगर मंदिर बनाने में काफी वक्त लगा। रमेश लखवानी ने बताया कि चंदा समाज के लोगों से ही लेना था। इसलिए समय लगा। उस समय 2.50 लाख रुपये जुटा था। इसी से मंदिर का निर्माण हुआ। बाद में बाकी निर्माण कराए गए।

महिलाएं गंगातट पर मांगती हैं मनौती
झूलेलाल जयंती पर महिलाएं मनौती (पल्लव) मांगती हैं। महिलाएं घर से प्रमुख रूप से प्रसाद में आग पर सेंकी हुई रोटी, मीठी तहरी, भीगा चना झूलेलाल मंदिर लेकर जाती हैं। बहराणा साहिब (सांकेतिक दीप) में भेंट करती हैं। इसे ही अनुयायियों में बांटा जाता है। मंदिर से निकलने वाली शोभायात्रा के साथ दशाश्वमेध घाट पहुंचकर झूलेलाल व मां गंगा की पूजा होती है। इस दौरान महिलाएं अपनी मनचाहे मुराद के लिए मनौती मांगती हैं। जिनकी मुराद पूरी हो गई है, वह मिठाई चढ़ाकर बांटते हैं।
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