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Ram Mandir:25 दिनों की खोज में खोजवां में मिली काशी की जनकपुरी, यहां राजा जनक ने की थी तपस्या; ऐसे मिले प्रमाण
Tue, 16 Jan 2024 04:05 PM IST
प्रगति चंद
आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी
आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी
Published by: प्रगति चंद
Updated Tue, 16 Jan 2024 04:05 PM IST
सार
काशी की जनकपुरी में राजा जनक ने तपस्या करने के साथ ही यहां मिथिलेश्वर शिवलिंग स्थापित किया था। इसे मिथिलेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। महाभारत, गीता, काशीखंड समेत 15 पुस्तकों के अध्ययन के बाद प्रमाण मिले हैं।
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janakpuri varanasi
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सप्तपुरियों के बाद काशी में जनकपुरी का भी पता चल गया है। प्रमाणों के आधार पर काशी की जनकपुरी खोजवां में है। 25 दिनों की खोज और 15 पुस्तकों के अध्ययन के बाद काशी के विद्वानों ने इसे प्रमाणित भी कर दिया है। मंदिर की खोदाई में निकले प्रमाण आज भी मौजूद हैं। इसके मुताबिक, राजा जनक ने यहीं पर तपस्या की और मिथिलेश्वर शिवलिंग को स्थापित किया।
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काशी में मिली जनकपुरी की दूरी दशाश्वमेध क्षेत्र स्थित काशी की अयोध्यापुरी से छह किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में है। मूल अयोध्या से जनकपुरी भी दक्षिण पश्चिम दिशा में बसी है। वहां आसपास अनेक कुंड और तीर्थ हैं। खोजवां भी अनेक तीर्थ और कुंड मौजूद हैं। जनकपुरी की यह स्थिति सिद्ध करती है कि यही काशी की जनकपुरी है।
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बीएचयू के प्रो. माधव जनार्दन रटाटे और ब्राह्मण महासभा के अजय शर्मा ने बताया कि त्रेतायुग में शिवभक्त राजा जनक ने शिव आराधना करके काशी की जनकपुरी में शिवलिंग स्थापित किया था। इसे मिथिलेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यह शिवलिंग शुष्केश्वर महादेव मंदिर के प्रांगण में विराजमान हैं। शुष्केश्वर के पश्चिम में जनकेश्वर या मिथिलेश्वर शिवलिंग हैं। यह शिवलिंग पश्चिम की ओर मुखवाला है।
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शिव के दर्शन के लिए पहुंचे थे ब्राह्मण
मान्यता है कि उनके दर्शन मात्र से मनुष्य व्यथा रहित हो जाता है। किसी काल खंड में यहीं से होकर शुष्का अर्थात असि नदी गुजरती थी। जनकपुरी की खोज के लिए बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के धर्मशास्त्र मीमांसा विभाग के प्रो. माधव जनार्दन रटाटे, महेश शंकर उपाध्याय, महंत नरेंद्र पांडेय, भृगु संहिता विशेषज्ञ वेदमूर्ति शास्त्री, मनीष पांडेय, प्रो. उपेंद्र देव पांडेय और सुधांशु पांडेय, केंद्रीय ब्राह्मण महासभा के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा शामिल रहे। महाभारत, गीता, पद्मपुराण, काशीखंड, वाल्मीकि रामायण सहित 15 पुस्तकों का अध्ययन किया गया।
काशी खंड के अनुसार, भगवान शिव के काशी आगमन पर दर्शन के लिए काशीपुरा वृषभध्वजतीर्थ से तीन सौ नब्बे, यक्षिणीकुंड से तेरह सौ, लक्ष्मीकुंड से सोलह सौ, पिशाचमोचन तीर्थ से सात सहस्र, पितृकुंड से एक सौ, ध्रुवतीर्थ से छह सौ, मानसरोवर से पांच सौ, वासुकिहृद से दश सहस्र, जानकीकुंड (सीताकुंड) से आठ सौ, गौतमकुंड से नौ सौ ब्राह्मण पहुंचे थे।
महाभारत काल में था जंगल
महाभारत काल में जनकपुर एक जंगल के रूप में था। यहां पर साधु-महात्मा तपस्या किया करते थे। पुराणों के अनुसार, जनकपुर के चारों ओर रक्षक देवता के रूप में मिथिलेश्वर सहित अन्य नाम से शिव मंदिर थे। आसपास लगभग 115 सरोवर थे। काशीपुरी की जनकपुरी में मंदिर के समीप सीताकुंड है, जो अब पाटा जा रहा है और निकट ही जानकी मंदिर भी है। इस मंदिर के एक ओर असि नदी है और निकट तीर्थ कुंड थे।
काशी खंड के अनुसार, भगवान शिव के काशी आगमन पर दर्शन के लिए काशीपुरा वृषभध्वजतीर्थ से तीन सौ नब्बे, यक्षिणीकुंड से तेरह सौ, लक्ष्मीकुंड से सोलह सौ, पिशाचमोचन तीर्थ से सात सहस्र, पितृकुंड से एक सौ, ध्रुवतीर्थ से छह सौ, मानसरोवर से पांच सौ, वासुकिहृद से दश सहस्र, जानकीकुंड (सीताकुंड) से आठ सौ, गौतमकुंड से नौ सौ ब्राह्मण पहुंचे थे।
महाभारत काल में था जंगल
महाभारत काल में जनकपुर एक जंगल के रूप में था। यहां पर साधु-महात्मा तपस्या किया करते थे। पुराणों के अनुसार, जनकपुर के चारों ओर रक्षक देवता के रूप में मिथिलेश्वर सहित अन्य नाम से शिव मंदिर थे। आसपास लगभग 115 सरोवर थे। काशीपुरी की जनकपुरी में मंदिर के समीप सीताकुंड है, जो अब पाटा जा रहा है और निकट ही जानकी मंदिर भी है। इस मंदिर के एक ओर असि नदी है और निकट तीर्थ कुंड थे।