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जगन्नाथ प्रसाद ने दुनिया तक पहुंचाया बनारस का शिल्प, पांच पीढ़ियों से तैयार कर रहे बनारसी साड़ी
amarujala.com, presented by जयेंद्र नाथ चतुर्वेदी
Updated Wed, 22 Nov 2017 02:26 PM IST
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जगन्नाथ प्रसाद
- फोटो : अमर उजाला
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बनारसी साड़ी की पूरी दुनिया में धूम यूं ही नहीं। पीढ़ियों की लगन और मेहनत से तराशी गई परंपराओं के इस शिल्प की एक चमक आप रामनगर में देख सकते हैं। जैसे बनारसी साड़ी की बेहद खूबसूरत कारीगरी के मुरीद हैं, वैसे ही उस शिल्प को कलेजे से लगाए कला साधक भी।
रामनगर के साहित्यनाका के 90 वर्षीय जगन्नाथ प्रसाद ऐसे ही शिल्पियों में हैं, जिन्होंने बनारसी शिल्प की पुश्तैनी कला को न सिर्फ आजीविका के लिए अपनाया बल्कि अपनी साधना और मेहनत से उसे नई ऊंचाई तक ले गए।
आज उनके यहां तैयार बनारसी साड़ियां दुनिया के आधा दर्जन से अधिक देशों तक जाती हैं। पांच पीढ़ियों से चली आ रही पुश्तैनी विरासत को अब नई पीढ़ी भी नए प्रयोग और नई तकनीक के साथ सहेजने के लिए तैयार है। जगन्नाथ प्रसाद का पूरा कुनबा बनारसी साड़ी के कारोबार से जुड़ा है।
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रामनगर के इस मास्टर शिल्पी ने भी दूसरे शिल्पियों की तरह कई उतार-चढ़ाव देखे। बताया कि कई बार ऐसी स्थितियां आईं जब यह लगा कि कोई और काम शुरू किया जाए लेकिन पुश्तैनी शिल्प से नाता इतना गहरा जुड़ चुका था कि कभी छोड़ते नहीं बना।
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रामनगर के साहित्यनाका के 90 वर्षीय जगन्नाथ प्रसाद ऐसे ही शिल्पियों में हैं, जिन्होंने बनारसी शिल्प की पुश्तैनी कला को न सिर्फ आजीविका के लिए अपनाया बल्कि अपनी साधना और मेहनत से उसे नई ऊंचाई तक ले गए।
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आज उनके यहां तैयार बनारसी साड़ियां दुनिया के आधा दर्जन से अधिक देशों तक जाती हैं। पांच पीढ़ियों से चली आ रही पुश्तैनी विरासत को अब नई पीढ़ी भी नए प्रयोग और नई तकनीक के साथ सहेजने के लिए तैयार है। जगन्नाथ प्रसाद का पूरा कुनबा बनारसी साड़ी के कारोबार से जुड़ा है।
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रामनगर के इस मास्टर शिल्पी ने भी दूसरे शिल्पियों की तरह कई उतार-चढ़ाव देखे। बताया कि कई बार ऐसी स्थितियां आईं जब यह लगा कि कोई और काम शुरू किया जाए लेकिन पुश्तैनी शिल्प से नाता इतना गहरा जुड़ चुका था कि कभी छोड़ते नहीं बना।
बनारसी साड़ी की मांग नहीं होगी कम
जगन्नाथ प्रसाद द्बारा बनाई गई बनारसी साड़ी
- फोटो : अमर उजाला
बनारसी साड़ी की परंपरा के बारे में जगन्नाथ प्रसाद बताते हैं कि प्राचीन काल में काशी में 600 से ज्यादा रियासतों का प्रतिनिधित्व हुआ करता था। सभी रियासतों की अपनी विशेष कला और शिल्प था। उसी आधार पर वस्त्र खासकर साड़ियों की बुनाई हुआ करती थी।
बनारसी साड़ी के शिल्प ने इन सभी कलाओं को अपने में समाहित किया। 18वीं शताब्दी के दौर में जगन्नाथ प्रसाद के पुरखे बनारसी साड़ी की समृद्ध हो चुकी कला से जुड़े। रिश्ता इतना गहरा हुआ कि जगन्नाथ प्रसाद से होते हुए अब पांचवीं पीढ़ी भी इसे संवारने में जुटी है।
पौत्र कुनाल आईआईटी करने के बाद अब टेक्सटाइल में अनुभव प्राप्त कर पुश्तैनी कारोबार को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। दो अन्य पौत्र बीएड कर साड़ी के कारोबार में हाथ बंटा रहे हैं।
घर की दो बेटियां फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही हैं। जगन्नाथ कहते हैं कि साड़ी निर्माण में बुनकरों का समर्पण पहले से कम हुआ है लेकिन नई पीढ़ी जागरूक है और नए दौर में बनारसी साड़ी की मांग कभी कम नहीं होने वाली।
बनारसी साड़ी के शिल्प ने इन सभी कलाओं को अपने में समाहित किया। 18वीं शताब्दी के दौर में जगन्नाथ प्रसाद के पुरखे बनारसी साड़ी की समृद्ध हो चुकी कला से जुड़े। रिश्ता इतना गहरा हुआ कि जगन्नाथ प्रसाद से होते हुए अब पांचवीं पीढ़ी भी इसे संवारने में जुटी है।
पौत्र कुनाल आईआईटी करने के बाद अब टेक्सटाइल में अनुभव प्राप्त कर पुश्तैनी कारोबार को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। दो अन्य पौत्र बीएड कर साड़ी के कारोबार में हाथ बंटा रहे हैं।
घर की दो बेटियां फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही हैं। जगन्नाथ कहते हैं कि साड़ी निर्माण में बुनकरों का समर्पण पहले से कम हुआ है लेकिन नई पीढ़ी जागरूक है और नए दौर में बनारसी साड़ी की मांग कभी कम नहीं होने वाली।