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...भारतीय भले मर जाएं, ब्रिटिश खच्चर नहीं मरना चाहिए

Tue, 07 Feb 2017 12:00 PM IST
ब्यूरो,अमर उजाला, आजमगढ़
ब्यूरो,अमर उजाला, आजमगढ़ Updated Tue, 07 Feb 2017 12:00 PM IST
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Indians may die, but British mule should not dai
कर्नल निजामुद्दीन - फोटो : अमर उजाला
कर्नल निजामुद्दीन की प्राथमिक शिक्षा घर पर ही हुई। उन्होंने दीनी तालीम पाई थी। बचपन गांव  में ही गुजरा। युवावस्था में वह सिंगापुर चले गए। वहां उनके पिता इमाम अली कैंटीन चलाते थे। सिंगापुर पहुंच कर वह पिता का हाथ बंटाने लगे।
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द्वितीय विश्वयुद्ध के कुछ दिनों पहले वह ब्रिटिश आर्मी में भर्ती हो गए। ब्रिटिश आर्मी और जापान के बीच जब युद्ध चल रहा था एक दिन ब्रिटिश आर्मी चीफ ने फौज को निर्देश दिया कि भारतीय भरे मर जाएं लेकिन ब्रिटिश खच्चर नहीं मरना चाहिए।
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यह सुनकर निजामुद्दीन का मन ब्रिटिश सेना के प्रति घृणा से भर गया। वह नेताजी सुभाषचंद्र बोस के पास पहुंचे और अपनी व्यथा सुनाई। नेताजी ने उनको आजाद हिंद फौज में भर्ती कर लिया। साथ ही उन्हें कर्नल की उपाधि भी दी। वह नेताजी के चालक के साथ ही अंगरक्षक भी बन गए। 
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1943 में सिंगापुर के कैथो हॉल में नेताजी ने तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा का नारा देने के साथ ही कई देशों का पनडुब्बी से भ्रमण किया। कर्नल निजामुद्दीन इस दौरान नेता जी के साथ रहे। वह टोक्यो में नेताजी के साथ जापान के प्रधानमंत्री तोजो से मिले।

वहां नेताजी ने जापान से आजाद हिंद फौज के लिए मदद मांगी। जर्मनी यात्रा के दौरान नेताजी ने हिटलर से निजामुद्दीन का परिचय बहादुर और अच्छे निशानेबाज के रूप में कराया था। हिटलर ने कर्नल निजामुद्दीन के  निशानेबाजी की परीक्षा ली और उससे प्रभावित होकर उन्हें एक गन भेंट की।

जापान में निशानेबाजी से खुश होकर हिटलर ने भेंट की थी गन

Indians may die, but British mule should not dai
अपनी पत्नी अजबुन्निसा और पुत्र मोहम्मद अकरम के साथ बैठे नेताजी सुभाषचंद्र बोस के चालक रहे निजामुद्दीन।
यह गन सन 1971 तक कर्नल निजामुद्दीन  के पास सुरक्षित थी। कर्नल निजामुद्दीन ने नेताजी के साथ एक लम्बा समय गुजारा और अपनी ईमानदारी और बहादुरी की बदौलत आजाद हिंद फौज में बड़ा योगदान दिया।

निजामुद्दीन सन 1947 ई0 में बर्मा में छितांग नदी के किनारे पर नेताजी के साथ आखिरी बार रहे फिर उनके कहने पर भूमिगत हो गए। उसके बाद वे छुप छुप कर  रहने लगे और अज्ञातवास का जीवन गुजारते रहे। 1969 में अपने गांव ढ़कवा आए।

गांव में रहकर भी वह अपनी पहचान छिपाए हुए थे। उनके बारे में सिर्फ परिवार के लोग ही जानते थे। अमर उजाला ने सन 2002 में  कर्नल निजामुद्दीन को नेता सुभाष चन्द्र बोस के अंगरक्षक एवं  चालक के रूप में ढ़ूंढ निकाला। इसके बाद कर्नल निजामुद्दीन चर्चा में आए।


समय-समय पर कर्नल  निजामुद्दीन नेताजी सुभाषचंद्र बोस के साथ बिताए पल की चर्चा किया करते थे। उनके जीवन पर एक पुस्तक दी कर्नल निजामुद्दीन लिखी गई है लेकिन इसका विमोचन अभी तक नहीं हो सका है।
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