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पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण से तृप्त होते हैं पितर

Fri, 09 Sep 2022 12:03 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 09 Sep 2022 12:03 AM IST
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In Pitru Paksha, ancestors are satisfied with Shradh and Tarpan.
पितृपक्ष में श्राद्ध करने से संपूर्ण फल की प्राप्ति होती है। पितरों का पूजन कर श्राद्ध कर्म किया जाता है। विधिविधान से तर्पण के फल स्वरूप पितरों का आशीर्वाद हमें प्राप्त होता है। मान्यता है कि पितृपक्ष के समय सभी पितर पृथ्वी लोक में निवास करते हैं और वह उम्मीद करते हैं कि उनकी संतान उनके लिए श्राद्ध और तर्पण करे।
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ज्योतिषाचार्य श्रीनाथ प्रपन्नाचार्य के अनुसार, पितृपक्ष की प्रतिपदा का आरंभ 10 सितंबर से हो रहा है और 25 सितंबर को पूर्ण होगा। श्राद्ध व तर्पण कार्यों से पितर तृप्त होते हैं और आशीर्वाद देकर अपने लोक चले जाते हैं, जो लोग अपने पितरों को तृप्त नहीं करते हैं, वे उनके श्राप के भागी बनते हैं, जिसकी वजह से उनके जीवन में कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। पितरों के श्राप के कारण संतान सुख में भी बाधा आती है।
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क्या करें
पितरों को स्मरण करें।
तर्पण करते हैं तो पूरे पक्ष में ब्रह्मचर्य का पालन करें।
पानी में काला तिल, फूल, दूध, कुश मिलाकर तर्पण करें।
रोज स्नान के समय जल से ही पितरों को तर्पण करें।
पितरों के लिए भोजन रखें। फिर उसे गाय, कौआ, कुत्ते को खिला दें।
श्राद्ध कर्म सुबह 11.30 से दोपहर 02.30 बजे के मध्य संपन्न कर लेना चाहिए।
श्राद्ध के लिए दोपहर में रोहिणी और कुतुप मुहूर्त को श्रेष्ठ माना जाता है.
पितरों के देव अर्यमा को अवश्य जल अर्पित करना चाहिए।
क्या न करें
पितृपक्ष के समय लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा आदि का सेवन न करें।
घर के बुजुर्गों और पितरों का अपमान न करें, यह पितृ दोष का कारण बन सकता है।
पितृपक्ष में स्नान के समय तेल, उबटन का प्रयोग वर्जित है।
कोई भी धार्मिक या मांगलिक न करें। ऐसे कार्य अशुभ होते हैं।
कुछ लोग नए वस्त्रों को खरीदना और पहनना भी अशुभ मानते हैं।
पंचबलि का विशेष महत्व
पितृपक्ष में पंचबलि का विशेष महत्व है। इसमें प्रथम बलि गाय को दूसरी श्वान को, तीसरी काक को चौथी देवादि बलि देवों के निमित्त देव स्थान पर रखें और पांचवीं पिपिलिकादि बलि चींटी के लिए डालें।
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