काशी विद्यापीठ में आचार्य ने रोपी समाजवाद की नर्सरी, बीएचयू और विद्यापीठ के कुलपति पद को किया सुशोभित
आचार्य नरेंद्रदेव ने काशी विद्यापीठ में ही समाजवाद की नर्सरी रोपी थी। आदर्श और विचारधारा के लिए लड़ना और उस विचारधारा को अपने ज्ञान और सोच से सींचकर आम जीवन में आजमाना यह किसी सामान्य व्यक्ति का काम नहीं है। काशी विद्यापीठ और बीएचयू के कुलपति पद को सुशोभित करने वाले आचार्य नरेंद्रदेव आम आदमी के लिए बेहद सहज और सरल थे।
वह योग्य शिक्षक ही नहीं, राजनीतिज्ञ, मेधावी छात्र, विचारक और व्याख्याता भी थे। काशी विद्यापीठ के प्रो. आरपी पांडेय ने बताया कि क्वींस कॉलेज से पुरातत्वशास्त्र की पढ़ाई के दौरान सच्चिदानंद सान्याल ने इनकी मुलाकात कई क्रांतिकारियों से करवाई। पढ़ाई करते हुए ही नरेंद्र देव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए। लिहाजा लोकमान्य तिलक, आरसी दत्त व जस्टिस रानाडे जैसे क्रांतिकारियों के प्रभाव में रहे।
नरेंद्र देव ने फैजाबाद में होमरूल लीग की शाखा स्थापित की और उसके नेता चुने गए। नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन से जुड़ने के लिए उन्होंने वकालत छोड़ दी। 1926 में भारत रत्न डॉ. भगवानदास के त्यागपत्र देने के बाद उन्हें काशी विद्यापीठ का आचार्य बनाया गया। 1934 में जय प्रकाश नारायण के सुझाव पर सोशलिस्ट पार्टी के उद्घाटन सत्र में नरेंद्र देव को चेयरमैन बनाया गया। इसके बाद वे जीवन भर समाजवादी विचारधारा से जुड़े रहे।
काशी विद्यापीठ से उन्होंने समाजवादी विचारधारा की शुरुआत की। आचार्य जी ईमानदारी और नैतिकता को सर्वोच्च स्थान पर रखते थे। जब कांग्रेस से मतभेद हुआ तो उन्होंने नैतिकता के आधार पर विधानसभा से इस्तीफ दे दिया। बाद में फैजाबाद में उपचुनाव हुआ। कांग्रेस ने उनके खिलाफ देवरिया के समाजसेवी संत बाबा राघवदास को खड़ा कर दिया।
लोगों ने राघवदास से सवाल पूछा कि क्या वह आचार्य नरेंद्रदेव से लड़ेंगे। बाबा राघवदास का जवाब था मैं आचार्य से कैसे लड़ सकता हूं। मेरा उनका क्या मुकाबला, मैं तो कांग्रेस की ओर से सोशलिस्ट पार्टी से लड़ने जा रहा हूं। उस उपचुनाव में बाबा राघवदास जीत गए। चुनाव परिणाम पर आचार्य मुस्करा पड़े थे।
आचार्य से जुड़ी कुछ प्रमुख जानकारियां
- जन्म- 31 अक्तूबर 1889, सीतापुर, उत्तर प्रदेश।
- मृत्यु- 19 फरवरी 1956, मद्रास।
- 1916 के आसपास फैजाबाद में होमरूल लीग की स्थापना की।
- 1920 में असहयोग आंदोलन से जुड़ने के लिए वकालत का पेशा छोड़ा।
- 1926 में काशी विद्यापीठ से जुड़े।
- 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के उद्घाटन सत्र में इसके चेयरमैन बने।
- 1947 से 1951 तक लखनऊ विश्वविद्यालय व 1951 से 1953 तक बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे।
- 1948 में फैजाबाद से उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य बने पर कांग्रेस छोड़ने पर दिया इस्तीफा।
- 1952 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के बैनर तले लोकसभा का चुनाव लड़ा।