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गंगाजल पर IIT ने शुरू किया अध्ययन, यूपी के 321 कारखानों की हो रही मॉनीटरिंग
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Fri, 08 Jun 2018 03:14 PM IST
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केंद्र सरकार के ‘नमामि गंगे’ प्रोजेक्ट में तकनीकी संस्थानों से सहयोग की शुरुआत हो गई है। आईआईटी रुड़की, कानपुर, जोधपुर, पटना, आईआईटी बीएचयू, एमएनआईटी इलाहाबाद समेत कई तकनीकी संस्थानों ने गंगाजल की स्थिति पर अध्ययन कर रहे हैं।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इन संस्थानों से अपेक्षा की है कि वे कारखानों से गंगा में गिरने वाले जल के शोधन की स्थिति का पता लगाकर बताएं।
पूरी कार्ययोजना में आईआईटी बीएचयू की अहम हिस्सेदारी है।
आईआईटी बीएचयू को कानपुर, उन्नाव समेत पूर्वांचल के अलग-अलग जिलों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन शहरों के 321 कारखानों की मॉनिटरिंग की जा रही है। पता लगाया जा रहा है कि कारखानों में अवजल के शोधन की क्या स्थिति है। गंगा में पानी शोधित कर छोड़ा जा रहा है या नहीं। कारखानों में जल शोधन यंत्र लगे हैं या नहीं।
आईआईटी बीएचयू के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के हेड प्रो. पीके मिश्र बताते हैं कि मार्च में शुरू प्रोजेक्ट के तहत टेक्सटाइल, लौह उद्योग, से लेकर फूड बेवरेज, एग्रो इंडस्ट्रीज आदि के शोधन प्रणाली की मॉनिटरिंग की जा रही है।
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कई कारखाने ऐसे मिले, जहां शोधन यंत्र नहीं है। जहां जल शोधन संयंत्र लगे हैं, वहां बिजली खर्च बचाने के लिए बिना पंप कैनाल चलाए पानी गंगा में छोड़ा जा रहा है। ऐसे मामलों की समग्र रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
इसे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपी जाएगा। बताया कि अध्ययन का मुख्य बिंदु ये भी है इंडस्ट्री कितना जल दोहन कर रही है। जितना जल दोहन हो रहा है उसका कितना इस्तेमाल हो रहा है, उसे कितना रिसाइकल किया जा रहा है।
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केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इन संस्थानों से अपेक्षा की है कि वे कारखानों से गंगा में गिरने वाले जल के शोधन की स्थिति का पता लगाकर बताएं।
पूरी कार्ययोजना में आईआईटी बीएचयू की अहम हिस्सेदारी है।
आईआईटी बीएचयू को कानपुर, उन्नाव समेत पूर्वांचल के अलग-अलग जिलों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन शहरों के 321 कारखानों की मॉनिटरिंग की जा रही है। पता लगाया जा रहा है कि कारखानों में अवजल के शोधन की क्या स्थिति है। गंगा में पानी शोधित कर छोड़ा जा रहा है या नहीं। कारखानों में जल शोधन यंत्र लगे हैं या नहीं।
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आईआईटी बीएचयू के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के हेड प्रो. पीके मिश्र बताते हैं कि मार्च में शुरू प्रोजेक्ट के तहत टेक्सटाइल, लौह उद्योग, से लेकर फूड बेवरेज, एग्रो इंडस्ट्रीज आदि के शोधन प्रणाली की मॉनिटरिंग की जा रही है।
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कई कारखाने ऐसे मिले, जहां शोधन यंत्र नहीं है। जहां जल शोधन संयंत्र लगे हैं, वहां बिजली खर्च बचाने के लिए बिना पंप कैनाल चलाए पानी गंगा में छोड़ा जा रहा है। ऐसे मामलों की समग्र रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
इसे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपी जाएगा। बताया कि अध्ययन का मुख्य बिंदु ये भी है इंडस्ट्री कितना जल दोहन कर रही है। जितना जल दोहन हो रहा है उसका कितना इस्तेमाल हो रहा है, उसे कितना रिसाइकल किया जा रहा है।