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BHU ने विकसित की नई डिवाइस: पार्किंसन और अवसाद की बीमारियों का पता लगाएगा एसईआरएस, जानें- क्या है विशेषता

Mon, 08 Jul 2024 04:07 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: प्रगति चंद Updated Mon, 08 Jul 2024 04:07 PM IST
सार

आईआईटी बीएचयू ने नई डिवाइस विकसित की। यह डिवाइस पार्किंसंस, अवसाद और सिजोफ्रेनिया जैसी बीमारियों का सही समय पर पता लगाकर सटीक जानकारी देगी। 

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IIT BHU develops Lab on Chip metallic nanoparticle device to detect Parkinson and depression
आईआईटी बीएचयू ने विकसित की नई डिवाइस - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

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आईआईटी बीएचयू ने न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का सटीक पता लगाने के लिए एक डिवाइस विकसित की है। एडवांस लैब ऑन चिप मेटलिक नैनो पार्टिकल (एसईआरएस) नाम की यह डिवाइस पार्किंसन, अवसाद और सिजोफ्रेनिया जैसी बीमारियों का सही समय पर पता लगाकर सटीक जानकारी देगी। यह मानव मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर की पहचान कर उसकी निगरानी भी करती है।

आईआईटी बीएचयू के सिरेमिक इंजीनियरिंग विभाग के नैनोमैटीरियल्स फॉर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड एनर्जी डिवाइसेस (एनईईडी) लैब के वैज्ञानिकों ने मानव मस्तिष्क में न्यूरोट्रांसमीटर डोपामाइन की समय पर पहचान और निगरानी करने में सक्षम आधुनिक तकनीक की खोज की है। इससे न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के इलाज में आसानी होगी। यह बीमारी के शुरुआती चरण का पता लगाने के लिए बायोमार्कर सेंसिंग के रूप में काम करता है। उपकरण का नाम एडवांस लैब ऑन चिप मेटेलिक नैनोपार्टिकल है, जो पतला और 2-डी सेमीकंडक्टर है। इसमें उन्नत सतह-संवर्धित रमन स्कैटरिंग (एसईआरएस) तकनीक का उपयोग किया जाता है।

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सिरेमिक इंजीनियरिंग के वैज्ञानिक डॉ. शांतनु दास एवं रिसर्च स्कॉलर उम्मियॉ कमर ने दो वर्ष के रिसर्च के बाद यह डिवाइस बनाने में सफलता पाई है। इसे अमेरिकन केमिकल सोसाइटी जर्नल में प्रकाशित किया गया है। सहायक प्रोफेसर और वैज्ञानिक डॉ. शांतनु दास ने बताया कि यह लैब-ऑन-चिप अगली पीढ़ी के लिए काफी उपयोगी है। मानव मस्तिष्क में अगर डोपामाइन का स्तर कम हो जाए तो यह पार्किंसन और अवसाद जैसी बीमारियों का कारण बनता है और अगर जरूरत से ज्यादा हो जाए तो एंग्जाइटी की समस्या हो सकती है।
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अधिक डोपामाइन से आवेग नियंत्रण में बाधा

यह चिप पार्किंसन, अवसाद और यहां तक कि सिजोफ्रेनिया जैसी बीमारियों की आशंका का पता लगाकर जान बचा सकता है। शोधार्थी उम्मियॉ कमर ने बताया कि जब डोपामाइन का स्तर बहुत अधिक होता है, तो यह मानव शरीर के आवेग नियंत्रण में बाधा उत्पन्न कर सकता है, जिससे कभी-कभी आक्रामक व्यवहार हो सकता है। हंटिंगटन की बीमारी, जो तंत्रिका कोशिकाओं को धीरे-धीरे टूटने का कारण बनती है, जिससे हाइपरकाइनेटिक/अनियंत्रित गतिविधियां होती हैं, मानव शरीर में अत्यधिक डोपामाइन का परिणाम है।

कम डोपामाइन से थकान और सुस्ती
दूसरी ओर अगर डोपामाइन ज्यादा नीचे चला जाता है तो व्यक्ति को प्रेरणा की कमी, थकान और सुस्ती महसूस होती है, जिससे गंभीर अवसाद होता है। न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए यह आविष्कार उपयोगी हो सकता है। यह न केवल न्यूरोट्रांसमीटर सेंसिंग के बारे में हमारी समझ बढ़ाता है, बल्कि उपचार की रणनीति को बदलने और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से पीड़ित लोगों का जीवन बेहतर बनाने की क्षमता भी रखता है।

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