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News: अंग्रेजी शासन में मजदूरों के पलायन पर 1.20 करोड़ से तैयार करेंगे शोध रिपोर्ट, ICSSR ने दिया फंड

Sat, 20 Sep 2025 03:03 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sat, 20 Sep 2025 03:03 PM IST
सार

शोध में भाषा, शिक्षा, इतिहास, वाणिज्य से संबंधित चार शोधकर्ता और लंदन से दो शोधकर्ता सदस्य शामिल हैं। इस रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत कहानियों और आंकड़ों को उन देशों में जाकर जुटाना होगा। 

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ICSSR to prepare research report on migration of labourers during British rule with 1.20 crore rupees funding
BHU - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

काशी हिंदू विश्वविद्यालय और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ को साझा रिसर्च के लिए 1.20 करोड़ रुपये की ग्रांट मिली है। भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) नई दिल्ली ने यह फंड अंग्रेजी शासनकाल के दौरान भारतीय श्रम प्रवास के सांस्कृतिक इतिहास विषय पर शोध करने के लिए दिया है। 

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चार साल तक चलने वाले इस शोध के लिए फिजी, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो के साथ ही ब्रिटेन, आयरलैंड, नीदरलैंड और ऑस्ट्रेलिया के अलग-अलग अभिलेखागारों को आंकड़ों और साक्ष्यों को जुटाना होगा। रिसर्च प्रोजेक्ट तैयार करने के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अलग-अलग देशों की ऐतिहासिक यात्राओं को भी ध्यान में रखा गया है।
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बीएचयू के महिला महाविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. चंदन श्रीवास्तव को शोध अध्ययन का प्रोजेक्ट डायरेक्टर बनाया गया है। वहीं, प्रोजेक्ट के कोऑर्डिनेटर काशी विद्यापीठ के प्रो. निरंजन सहाय हैं। दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय और हैदराबाद विश्वविद्यालय के भी प्रोफेसर और शोधछात्र इस साझा रिसर्च प्रोजेक्ट में शामिल हैं।

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गिरमिटिया मजदूरों के पलायन पर बनेगी रिपोर्ट
इस रिसर्च के तहत शोधकर्ता सबसे पहले एक रिपोर्ट तैयार करेंगे। इसमें देखेंगे कि कहां-कहां ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान भारतीय गिरमिटिया श्रमिकों का पलायन हुआ था और अब उनके बाद की कितनी पीढ़ियां उन देशों का सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक नेतृत्व कर रही हैं। 

डॉ. चंदन श्रीवास्तव ने बताया कि 2024-25 में मॉरीशस, फिजी और कैरिबियाई देशों की अपनी यात्राओं के दौरान प्रधानमंत्री ने कई बार अपने संबोधन में गिरमिटिया विरासत पर वैश्विक शोध करने के लिए विश्वविद्यालयों से आह्वान किया था। इसे ध्यान में रखकर ये प्रोजेक्ट बीएचयू और काशी विद्यापीठ की ओर से तैयार किया गया है। इसके बाद लंबे स्तर पर मानक चयन प्रक्रिया से गुजरने के बाद इस प्रस्ताव को आईसीएसएसआर ने अनुदान के लिए स्वीकृत किया है। 

भाषा वैज्ञानिक और समाजशास्त्री भी होंगे शामिल
डॉ. चंदन श्रीवास्तव ने कहा कि गिरमिटिया प्रवास का इतिहास सिर्फ इतिहासकारों के लिए ही नहीं, बल्कि शिक्षाशास्त्रियों, भाषा वैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों के लिए भी एक काफी अहम शोध क्षेत्र रहा है। भारत के भौगोलिक परिधि के बाहर कई देशों में भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार में गिरमिटिया समुदाय की पुरानी और वर्तमान पीढ़ी की भूमिका बहुत ही अहम है। इसे व्यापक शोध अध्ययनों से सबके सामने लाया जाएगा। 

वैश्विक प्रवासी समुदाय को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ा जाएगा
यह प्रोजेक्ट ऐसे देशों के साथ भारत की सांस्कृतिक-आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के साथ ही वैश्विक प्रवासी समुदायों को देश की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ेगा। वैश्विक नीतिगत मामलों में साक्ष्य आधारित सुझाव भी दिया जा सकता है। डॉ. चंदन ने इस प्रोजेक्ट के लिए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी, एमएमवी की प्राचार्य प्रो. रीता सिंह,  शिक्षा संकाय की डीन प्रो. अंजलि वाजपेयी और एसआरआईसी सेल ने काफी मदद की है। फिजी, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो, ब्रिटेन, आयरलैंड, नीदरलैंड और ऑस्ट्रेलिया से जुटाए जाएंगे आंकड़े

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