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हिंदी दिवस विशेषः बनारस में रची गई हिंदी की ‘मॉडल’ भाषा

Thu, 14 Sep 2017 11:36 PM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी Updated Thu, 14 Sep 2017 11:36 PM IST
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 Hindi Divas special story and history from varanasi
हिंदी दिवस
 बनारस हिंदी की जन्मस्थली है। यहीं से हिंदी को व्याकरण भी मिला और शब्दानुशासन भी। कबीर, तुलसी से लेकर जगन्नाथ दास रत्नाकर और भारतेंदु हरिश्चंद्र से प्रेमचंद तक ने हिंदी को अनेक सांचे-खांचे की बोलियों के शब्द भंडार को आत्मसात कर समृद्ध बनाया।
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भाषा निर्माण से लेकर हिंदी खड़ी बोली के विकास तक की धारा को बढ़ाने के लिए बनारस के अतुलनीय योगदान को हमेशा सिर -माथे रखा जाएगा।   
हिंदी दिवस पर गुरुवार को जाने माने कथाकार प्रो काशीनाथ सिंह ने अमर उजाला से बातचीत में हिंदी के समृद्धशाली परंपरा के विकास पर रोशनी डाली।

उनका कहना है कि बनारस ने हिंदी को जो दिया वह न किसी ने दिया और अब न दे सकेगा। हिंदी की बोली ब्रज भी है, अवधी भी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में कबीर की तथाकथित सधुक्कड़ी भाषा भी हिंदी ही है।
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वह कहते हैं कि भोजपुरी का प्रयोग कबीर के साहित्य में सबसे अधिक मिलता है। जबकि तुलसी ने अपना साहित्य अवधी में रचा है। बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र, जगन्नाथ दास रत्नाकर का साहित्य ब्रजभाषा में मिलता है।
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भारतेंदु तो खड़ी बोली के निर्माता ही माने जाते हैं, जो आज बोली जाती है। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने उर्दू के शब्दों का हिंदी में प्रयोग करके हिंदी को हिंदुस्तानी बनाया। यानी आम हिंदुस्तानी का मतलब आम फहम की आम आदमी की जबान। 

बनारसी हिंदी की विशेषता

 Hindi Divas special story and history from varanasi
hindi
बनारस की हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपने शब्दकोष हिंदी से लेती है। फुटपाथ, ठेले, खोमचे वाले , पान की दुकानों से, बाजारों से शब्दों को चुनती है।  बनारस की हिंदी का एक और रूप दिखाई पड़ता है परिनिष्ठित भाषा में।

जो जयशंकर प्रसाद और रामचंद्र शुक्ल की भाषा में मिलता है। इस तरह बनारस की हिंदी मॉडल भाषा कही जा सकती है। शब्द भंडार हिंदी भोजपुरी से लेती है। डॉ. जितेंद्र नाथ मिश्र कहते हैं कि  हिंदी भाषा का पहला अधिकारिक और प्रमाणिक व्याकरण नागरी प्रचारिणी सभा ने कामता प्रसाद गुरु के द्वारा तैयार कराया।

उस दौर के मूर्धन्य विद्वानों की कमेटी ने मिलकर इसे अंतिम रूप दिया। प्रचारिणी ने ही हिंदी शब्दानुशासन आचार्य किशोरी दास वाजपेयी के जरिए तैयार कराया था। 12 खंडों में पहली बार हिंदी का शब्द सागर नागरी प्रचारिणी से ही प्रकाशित हुआ।

इस प्रकार हिंदी भाषा का विकास काशी से ही हुआ। वह बताते हैं कि पहले फारसी में ही सरकारी दफ्तरों में अरजियां स्वीकार होती थीं। महामना मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में हिंदी में सरकारी दफ्तरों में आवेदन स्वीकार करने का आंदोलन इसी शहर से चला था।  
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