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हंसराज के सूफी गीतों पर झूमा गंगा का किनारा

Mon, 23 Nov 2015 02:17 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Mon, 23 Nov 2015 02:17 AM IST
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Hansraj of Ganga danced was an old Sufi songs on the beach
गंगा के सुरम्य तट पर रविवार की शाम गायकी के सूफियाने अंदाज से सुहानी बन गई। सुर-ताल के साथ तालियों की बौछार से मुक्ताकाशीय मंच देर रात तक सराबोर हुआ। सितार और मेंडोलिन की युगलबंदी पर रागों की खुशबू ने लुभाया तो कथक नृत्य पर भावों-इशारों पर लोग मुग्ध हुए।
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इसी तरह गायन, वादन और नृत्य के सुरमयी संगम से गंगा महोत्सव की पहली निशा का आगाज हुआ। फूलों से सजे मंच पर दीप प्रज्ज्वलन के बाद शुरुआत हुई जाने माने सूफी गायक हंसराज हंस के सुरीले अंदाज से।
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उन्होंने निदा फाजली की गजल- प्यासी है धरती पानी दे मौला... से संगीत निशा को मुकाम पर पहुंचाया। इसके बाद आ जा रे माही तेरा रस्ता तो बीत गया..की प्रस्तुति की। पंजाबी शैली में -ये जो सिल्ली सिल्ली आद्दी है हवा/कित्थे कोई रौंदा होगा ... के बोल पर एक बारगी तो संगीत प्रेमी हंसराज के साथ रमते हुए उनका साथ देने लगे।
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भाषा को लेकर श्रोताओं को होने वाली कठिनाईयों पर भी उनका ध्यान गया और फिर वो खुमार बाराबंकवी का कलाम पेश करने लगे। एक पल में एक सदी का मजा हमसे पूछिए /दो दिन की जिंदगी का मजा हमसे पूछिए...। इसके बाद समीर का लिखा फिल्म बिच्छू का गीत वह गुनगुनाने लगे। अंखिया लड़ी हो लड़ी बीच बजार...और तालियों, सीटियों के शोर गूंजने लगे।

दिल चोरी साडा हो गया के बाद दमादम मस्त कलंदर... की प्रस्तुति से उन्होंने विदा ली। हालंाकि इससे पहले हंस ने ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का नातिया कलाम भी पेश किया। इनके बाद प्रसिद्ध संतूर वादक पं. तरुण भट्टाचार्य के संतूर और स्नेहाशीष मजूमदार की मेंडोलिन पर युगलबंदी से संगीत निशा को उंचाई मिली।

तरुण ने राग चारुकेशी की आवतारणा छोटा खयाल की बंदिश के साथ की। इसमें छोटी-छोटी गत बजाकर उन्होंने हर किसी के मन के तार झंकृत किए। इसके बाद इस जोड़ी ने तीन ताल में विलंबित लय और फिर द्रुत लय की बंदिशें बजाकर स्वरों, तालों के समन्वय की बारीकियों से परिचित कराया।


राग मिश्र पहाड़ी में कशिश भरी धुन बजाकर इन्होंने विदा ली। तबले पर सुब्रतो भट्टाचार्य और बंग्ला लोक वाद्य श्रीखोल पर गोपाल बर्मन ने संगत की। इनके बाद गीतांजलि लाल और उनकी टीम ने कथक नृत्य पर भावों-इशारों से कान्हा के महारास से लेकर शिवतांडव तक की प्रस्तुति की। कलाकारों को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।
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