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ज्ञानवापी का सच: घंटियों से सजा स्तंभ और 2 मीटर चौड़ा कुआं मिला; देवी-देवताओं की मूर्तियां तहखाने में दबी मिली

Fri, 26 Jan 2024 09:32 AM IST
शाहरुख खान पुष्पेन्द्र कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी
पुष्पेन्द्र कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी Published by: शाहरुख खान Updated Fri, 26 Jan 2024 09:32 AM IST
सार

Gyanvapi Masjid Case: ज्ञानवापी में एक स्तंभ ऐसा मिला है, जिसे घंटियों से सजाया गया है। इसके चारों तरफ दीपक रखने के लिए स्थान बना है। स्तंभ पर संवत 1669 का शिलालेख भी है। तहखाना एस-1 में दो मीटर चौड़ा कुआं भी मिला है। मंदिर के केंद्रीय कक्ष के मुख्य प्रवेश द्वार को पत्थर की चिनाई से अवरुद्ध कर दिया गया।

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Gyanvapi Masjid Case Varanasi News Truth of Gyanvapi Pillar decorated with bells found, two meter wide well
Gyanvapi Masjid Case - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ज्ञानवापी की पश्चिमी दीवार पुराने मंदिर के पत्थरों से बनी है। यह आड़े (होरिजेंटल) सांचों से सुसज्जित है। दीवार से जुड़ा केंद्रीय कक्ष अभी भी अपरिवर्तित है, जबकि बाहर के दाे कक्षों में बदलाव कर दिया गया है।
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ज्ञानवापी स्थित चबूतरे के पूर्वी भाग में तहखाने को बनाते समय पहले के मंदिरों के स्तंभों का पुन: उपयोग किया गया। एक स्तंभ ऐसा मिला है, जिसे घंटियों से सजाया गया है। चारों तरफ दीपक रखने के लिए जगह बनी है। स्तंभ पर संवत 1669 का शिलालेख है। 
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वैज्ञानिक अध्ययन/सर्वे, वास्तुशिल्प अवशेषों, उजागर विशेषताओं व कलाकृतियों, शिलालेखों, कला व मूर्तियों के अध्ययन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मौजूदा संरचना के निर्माण से पहले हिंदू मंदिर मौजूद था।
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एएसआई की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, ज्ञानवापी के तहखाना एस-1 में दो मीटर चौड़ा कुआं है। इसे ढंका गया है। मंदिर में एक बड़ा केंद्रीय कक्ष और क्रमशः उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में कम से कम एक कक्ष था। उत्तर की ओर तीन कक्षों के अवशेष हैं। 

दक्षिण और पश्चिम में कक्ष अभी भी मौजूद हैं, लेकिन पूर्व में कक्ष के अवशेष और इसके आगे के विस्तार का भौतिक रूप से पता नहीं लगाया जा सका। पहले से मौजूद संरचना का केंद्रीय कक्ष मौजूदा संरचना का केंद्रीय कक्ष बनाता है। मोटी और मजबूत दीवारों वाली यह संरचना, सभी वास्तुशिल्प घटकों और फूलों की सजावट के साथ मस्जिद के मुख्य हॉल के रूप में उपयोग किया गया था।

ज्यामितीय डिजाइनों से सजाया गया गुंबद का अंदरूनी हिस्सा
पहले से मौजूद संरचना के सजाए गए मेहराबों के निचले सिरों पर उकेरी गई जानवरों की आकृतियां विकृत कर दी गई थीं। गुंबद के अंदरूनी हिस्से को ज्यामितीय डिजाइनों से सजाया गया है। मंदिर के केंद्रीय कक्ष का मुख्य प्रवेश द्वार पश्चिम से था, जिसे पत्थर की चिनाई से अवरुद्ध कर दिया गया था।

इस प्रवेश द्वार को जानवरों और पक्षियों की नक्काशी और एक सजावटी तोरण से सजाया गया था। इस बड़े मेहराबदार प्रवेश द्वार में एक और छोटा प्रवेश द्वार था। इस छोटे प्रवेश द्वार के ललाटबिंब पर उकेरी गई आकृति को काट दिया गया है।

इसका एक छोटा सा हिस्सा दिखाई देता है। क्योंकि, इसका अधिकांश हिस्सा ईंटों, पत्थर और मोर्टार से ढका हुआ है जिनका उपयोग प्रवेश द्वार को अवरुद्ध करने के लिए किया गया था। दरवाजे की चौखट पर उकेरी गई पक्षी की आकृति के अवशेष मुर्गे के प्रतीत होते हैं।
 

देवी-देवताओं की मूर्तियां तहखाने में मिट्टी के नीचे दबी मिली
सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, ज्ञानवापी के तहखानों में मूर्तिकला के अवशेष मिले हैं। हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां और नक्काशीदार वास्तुशिल्प तहखाना एस-2 में फेंकी गई हैं, जो मिट्टी के नीचे दबी मिली हैं। एक कमरे के अंदर मिले अरबी-फारसी शिलालेख में उल्लेख है कि मस्जिद का निर्माण औरंगजेब के 20वें शासनकाल (1676-77 ई.) में हुआ था।

कमल पदक की आकृतियों को खराब किया
एएसआई के अनुसार, ज्ञानवापी मौजूदा संरचना में प्रयुक्त स्तंभों और भित्ति स्तंभों का व्यवस्थित और वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन किया गया। मस्जिद के विस्तार और सहन के निर्माण के लिए स्तंभों और स्तंभों सहित पहले से मौजूद मंदिर के कुछ हिस्सों को थोड़े से संशोधनों के साथ पुन: उपयोग किया गया।

गलियारे में स्तंभों और स्तंभों के सूक्ष्म अध्ययन से पता चलता है कि वे मूल रूप से पहले से मौजूद हिंदू मंदिर का हिस्सा थे। मौजूदा संरचना में उनके पुन: उपयोग के लिए, कमल पदक के दोनों ओर उकेरी गई आकृतियों को खराब कर दिया गया और कोनों से पत्थर के द्रव्यमान को हटाने के बाद उस स्थान को पुष्प डिजाइन से सजाया गया। यह अवलोकन दो समान भित्ति स्तंभों द्वारा समर्थित है, जो अभी भी पश्चिमी कक्ष की उत्तरी और दक्षिणी दीवार पर अपने मूल स्थान पर मौजूद हैं।

एएसआई को सर्वे के दौरान बंदरों ने परेशान किया
बंदरों के आतंक से सहमे काशी के लोगों के साथ ही उनसे सर्वे के दौरान एएसआई की टीम भी परेशान हुई। एएसआई के अनुसार, बंदरों न केवल बाड़ वाले क्षेत्र के भीतर मुक्त आवाजाही में बाधा डाली। बल्कि, काम बंद होने के बाद भी वे क्षेत्र में अशांति फैलाते थे। मानसून के दौरान बंदर अक्सर दिन का काम खत्म होने के बाद तिरपाल फाड़ देते थे।
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