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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   gyanvapi Challenge to the appointment of Lord Vishwaeshwar amicus curiae revision petition filed

Gyanvapi: लॉर्ड विश्वेश्वर के वाद मित्र की नियुक्ति को चुनौती, पुनरीक्षण याचिका दायर; अब 15 जुलाई को सुनवाई

Thu, 10 Jul 2025 09:08 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Thu, 10 Jul 2025 09:08 PM IST
सार

Varanasi News: ज्ञानवापी के जमीन की अदला-बदली की चुनौती देने वाली याचिका में विपक्षीगणों और प्रतिवादीगण ने जवाबदेही नहीं दाखिल की। अगली सुनवाई पांच अगस्त को होगी।

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gyanvapi Challenge to the appointment of Lord Vishwaeshwar amicus curiae revision petition filed
ज्ञानवापी। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

Gyanvapi Case: ज्ञानवापी से जुड़े वर्ष 1991 के मूल व जनप्रतिनिधि वाद में लॉर्ड विश्वेश्वर की ओर से नियुक्त किए गए वाद मित्र अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी की नियुक्ति को चुनौती देते हुए अधिवक्ता अनुष्का तिवारी ने जिला न्यायाधीश जय प्रकाश तिवारी के समक्ष धारा 115 सीपीसी के तहत पुनरीक्षण याचिका दायर की है। इस पर 15 जुलाई को सुनवाई होगी। 

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अधिवक्ता अनुष्का तिवारी ने अपनी रिविजन याचिका में कहा है कि 11 अक्टूबर 2019 को पारित आदेश के जरिये अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी को मंदिर न्यास का सचिव बताकर बिना किसी सार्वजनिक सूचना के, एकतरफा व बिना पारदर्शिता के वाद मित्र नियुक्त किया गया, जिससे देवता एवं करोड़ों श्रद्धालुओं के हितों की अवहेलना हुई हैं।
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याचिका में कहा गया है कि यह नियुक्ति पारदर्शिता के बगैर और पूर्व नियोजित तरीके से की गई, जिसमें विजय शंकर रस्तोगी स्वयं वादी पक्ष के वकील भी रह चुके हैं। साथ ही उनकी नियुक्ति में उनके पुत्र का वकालतनामा और एकतरफा आवेदन प्रमुख भूमिका में रहा, जो कानूनन हितों का टकराव दर्शाता है। 

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ये है पूरा मामला

अधिवक्ता ने अपनी रिविजन याचिका में कहा कि जब उन्होंने इस मामले में निष्पक्ष और शीघ्र सुनवाई के लिए वाद को अग्रणी मामले के रूप में स्थानांतरित करने की याचिका दाखिल की, तब विजय शंकर रस्तोगी ने उसका भी विरोध किया और स्थानांतरण प्रार्थना को खारिज करवा दिया।

अधिवक्ता अनुष्का तिवारी ने खारिज आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका जिला न्यायालय में दाखिल किया है। पुनरीक्षण याचिका में यह मांग की गई है कि उक्त नियुक्ति के आदेश को रद्द किया जाए और भविष्य में वाद मित्र की नियुक्ति केवल सार्वजनिक सूचना व आपत्तियों के बाद की जाए। 

यह सुस्थापित कानून है कि वाद मित्र द्वारा देवता के हित में कार्य नहीं करते है, जबकि वाद जनप्रतिनिधि वाद हो तब भक्तों को वाद में देवता वादी के हित में हस्तक्षेप करने का अधिकार कानून द्वारा प्राप्त है।

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