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Gyanvapi Case: 27 साल पहले की रिपोर्ट का हवाला देकर बताया कैसे बंद हुआ था ताला, मसाजिद कमेटी ने दिया ये हवाला
Thu, 01 Feb 2024 09:36 AM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
Published by: शाहरुख खान
Updated Thu, 01 Feb 2024 09:36 AM IST
सार
Gyanvapi Case: वादी शैलेंद्र कुमार पाठक व्यास ने कोर्ट में ज्ञानवापी में अधिवक्ता आयुक्त की कमीशन की रिपोर्ट का हवाला दिया गया। बताया गया कि ज्ञानवापी में व्यास पीठ रही है।
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Gyanvapi Masjid case
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
ज्ञानवापी परिसर स्थित व्यासजी के तहखाने में 30 वर्ष बाद एक बार फिर पूजा-पाठ शुरू हो गया है। भोर मंगला आरती भी हुई। जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत ने बुधवार को अपने आदेश में कहा कि व्यासजी के तहखाने के रिसीवर जिला मजिस्ट्रेट को यह निर्देश दिया जाता है कि वह चौक थाना क्षेत्र के सेटलमेंट प्लाट नंबर-9130 में स्थित भवन के दक्षिण के तरफ स्थित तहखाने में स्थित मूर्तियों की पूजा राग-भोग काशी विश्वनाथ ट्रस्ट बोर्ड के पुजारी से कराएं।
30 जून 1996 की अधिवक्ता आयुक्त की रिपोर्ट का दिया हवाला
वादी शैलेंद्र कुमार पाठक व्यास ने अदालत में 30 जुलाई 1996 की ज्ञानवापी में अधिवक्ता आयुक्त की कमीशन की रिपोर्ट का हवाला दिया। रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिवादीगण द्वारा एक लोहे की बेरिकेडिंग प्राचीन मंदिर के अवशेष से सटे व कहीं-कही एक फुट व कहीं दो फुट व कहीं डेढ़ फुट की दूरी पर परिक्रमा मार्ग कहे जाने वाले स्थल पर की गई है।
दक्षिण स्थित तहखाने में जाने के लिए एक छोटा द्वार है। उसमें जाने के लिए बैरकेडिंग में कोई द्वार नहीं बनाया गया है। इसलिए अधिवक्ता कमिश्नर वादी संख्या-2 शोभनाथ व्यास के अधिवक्तागण व प्रतिवादी के अधिवक्ता और नगर मजिस्ट्रेट जेबी सिंह के साथ उत्तर स्थित बैरिकेडिंग में बने प्रवेश द्वार से होकर उक्त तहखाने के दक्षिण स्थित द्वार पर पहुंचा।
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जिसमें वादी संख्या-2 के ताले के अतिरिक्त एक और ताला बंद पाया गया। जिसे प्रतिवादी के अधिवक्ता ने प्रशासन का ताला लगा होना बताया। वादी संख्या-2 शोभनाथ व्यास ने अपनी चाबी से अपना ताला खोला, परंतु दूसरा ताला प्रशासन का लगा होने के कारण उक्त तहखाने में अंदर नहीं जाया जा सका। नगर मजिस्ट्रेट जेबी सिंह ने बताया कि न्यायालय के द्वारा चूंकि प्रतिवादी को ताला खोलने का निर्देश प्राप्त नहीं है, इसलिए उसे खोलना संभव नहीं है।
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30 जून 1996 की अधिवक्ता आयुक्त की रिपोर्ट का दिया हवाला
वादी शैलेंद्र कुमार पाठक व्यास ने अदालत में 30 जुलाई 1996 की ज्ञानवापी में अधिवक्ता आयुक्त की कमीशन की रिपोर्ट का हवाला दिया। रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिवादीगण द्वारा एक लोहे की बेरिकेडिंग प्राचीन मंदिर के अवशेष से सटे व कहीं-कही एक फुट व कहीं दो फुट व कहीं डेढ़ फुट की दूरी पर परिक्रमा मार्ग कहे जाने वाले स्थल पर की गई है।
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दक्षिण स्थित तहखाने में जाने के लिए एक छोटा द्वार है। उसमें जाने के लिए बैरकेडिंग में कोई द्वार नहीं बनाया गया है। इसलिए अधिवक्ता कमिश्नर वादी संख्या-2 शोभनाथ व्यास के अधिवक्तागण व प्रतिवादी के अधिवक्ता और नगर मजिस्ट्रेट जेबी सिंह के साथ उत्तर स्थित बैरिकेडिंग में बने प्रवेश द्वार से होकर उक्त तहखाने के दक्षिण स्थित द्वार पर पहुंचा।
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जिसमें वादी संख्या-2 के ताले के अतिरिक्त एक और ताला बंद पाया गया। जिसे प्रतिवादी के अधिवक्ता ने प्रशासन का ताला लगा होना बताया। वादी संख्या-2 शोभनाथ व्यास ने अपनी चाबी से अपना ताला खोला, परंतु दूसरा ताला प्रशासन का लगा होने के कारण उक्त तहखाने में अंदर नहीं जाया जा सका। नगर मजिस्ट्रेट जेबी सिंह ने बताया कि न्यायालय के द्वारा चूंकि प्रतिवादी को ताला खोलने का निर्देश प्राप्त नहीं है, इसलिए उसे खोलना संभव नहीं है।
वर्ष 1843 से 1936 तक के मुकदमों का दिया हवाला
शैलेंद्र कुमार पाठक व्यास की ओर से मुकदमे में अपने दावे के लिए वर्ष 1843, 1852, 1886, 1906 और 1935 के मुकदमों का हवाला दिया गया। बताया गया कि ज्ञानवापी में व्यास पीठ रही है। वर्ष 1936 के दीन मोहम्मद के मुकदमे का हवाला भी दिया और कहा कि ज्ञानवापी परिसर में ज्ञान मंडप, मुक्ति मंडप, वरोज मंडप, शोभा मंडप और शृंगार मंडप थे। प्राचीन मंदिर परिसर के भीतर देवताओं की पूजा होती थी।
शैलेंद्र कुमार पाठक व्यास की ओर से मुकदमे में अपने दावे के लिए वर्ष 1843, 1852, 1886, 1906 और 1935 के मुकदमों का हवाला दिया गया। बताया गया कि ज्ञानवापी में व्यास पीठ रही है। वर्ष 1936 के दीन मोहम्मद के मुकदमे का हवाला भी दिया और कहा कि ज्ञानवापी परिसर में ज्ञान मंडप, मुक्ति मंडप, वरोज मंडप, शोभा मंडप और शृंगार मंडप थे। प्राचीन मंदिर परिसर के भीतर देवताओं की पूजा होती थी।
सोमनाथ व्यास ने वर्ष 1991 में दाखिल किया था मुकदमा
ज्ञानवापी में नए मंदिर के निर्माण और हिंदुओं को पूजा-पाठ करने का अधिकार देने के लिए पंडित सोमनाथ व्यास, डॉ. रामरंग शर्मा और हरिहर पांडेय ने 15 अक्तूबर 1991 को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में मुकदमा दाखिल किया था। मुकदमे में कहा गया था कि विवादित स्थल प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर के मंदिर का अंश है। उस स्थान पर हिंदुओं को पूजा-पाठ, दर्शन-पूजन और अन्य धार्मिक क्रियाकलापों को संपन्न करने का अधिकार है। फिलहाल, यह मुकदमा भगवान विश्वेश्वर के वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी लड़ रहे हैं।
ज्ञानवापी में नए मंदिर के निर्माण और हिंदुओं को पूजा-पाठ करने का अधिकार देने के लिए पंडित सोमनाथ व्यास, डॉ. रामरंग शर्मा और हरिहर पांडेय ने 15 अक्तूबर 1991 को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में मुकदमा दाखिल किया था। मुकदमे में कहा गया था कि विवादित स्थल प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर के मंदिर का अंश है। उस स्थान पर हिंदुओं को पूजा-पाठ, दर्शन-पूजन और अन्य धार्मिक क्रियाकलापों को संपन्न करने का अधिकार है। फिलहाल, यह मुकदमा भगवान विश्वेश्वर के वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी लड़ रहे हैं।
मसाजिद कमेटी ने पूजा स्थल अधिनियम का दिया हवाला
अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी ने आवेदन देकर शैलेंद्र कुमार पाठक व्यास के आवेदन पर आपत्ति जताई है। कहा है कि यह मुकदमा पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 से बाधित है। व्यासजी का तहखाना ज्ञानवापी मस्जिद का हिस्सा है। ऐसे में यह वाद सुनवाई योग्य नहीं है। इसे खारिज किया जाए। अदालत ने मसाजिद कमेटी की आपत्ति पर वादी पक्ष से आपत्ति मांगते हुए सुनवाई की अगली तिथि आठ फरवरी नियत की है।
अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी ने आवेदन देकर शैलेंद्र कुमार पाठक व्यास के आवेदन पर आपत्ति जताई है। कहा है कि यह मुकदमा पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 से बाधित है। व्यासजी का तहखाना ज्ञानवापी मस्जिद का हिस्सा है। ऐसे में यह वाद सुनवाई योग्य नहीं है। इसे खारिज किया जाए। अदालत ने मसाजिद कमेटी की आपत्ति पर वादी पक्ष से आपत्ति मांगते हुए सुनवाई की अगली तिथि आठ फरवरी नियत की है।
कहा जाता है व्यास परिवार का हुआ करता था ज्ञानवापी परिसर
ज्ञानवापी परिसर व्यास परिवार का हुआ करता था, ऐसा काशी में कहा जाता है। शहर के पुरनियों के अनुसार पं. बैजनाथ व्यास एक तहखाने के साथ ही ज्ञानवापी हाता और आवास पर काबिज हुआ करते थे। श्री काशी विश्वनाथ धाम के सुंदरीकरण की परियोजना शुरू हुई तो मंदिर प्रशासन को व्यास आवास खरीदने की जरूरत पड़ी।
ज्ञानवापी परिसर व्यास परिवार का हुआ करता था, ऐसा काशी में कहा जाता है। शहर के पुरनियों के अनुसार पं. बैजनाथ व्यास एक तहखाने के साथ ही ज्ञानवापी हाता और आवास पर काबिज हुआ करते थे। श्री काशी विश्वनाथ धाम के सुंदरीकरण की परियोजना शुरू हुई तो मंदिर प्रशासन को व्यास आवास खरीदने की जरूरत पड़ी।
पं. सोमनाथ व्यास और एक अन्य भाई के उत्तराधिकारी ने अपना हिस्सा बेच दिया, लेकिन आवास का अस्तित्व रहने तक पं. केदारनाथ व्यास वहीं रहे। भवन का कुछ हिस्सा गिरने पर प्रशासन ने नगर निगम, वीडीए और लोक निर्माण विभाग से सत्यापन कराया। जर्जर पाए जाने पर भवन वर्ष 2017 में ढहा दिया गया। उसके बाद पं. केदारनाथ व्यास मंदिर के समीप स्थित एक किराये के भवन में रहे, जहां साल भर के भीतर उनकी मौत हो गई। भवन को लेकर मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट तक भी गया था।