Gyanvapi Case: व्यास परिवार का हुआ करता था ज्ञानवापी परिसर, हाता और आवास पर काबिज हुआ करते थे पं. बैजनाथ
काशी के पुरनियों के अनुसार ज्ञानवापी परिसर व्यास परिवार का हुआ करता था। पं. बैजनाथ व्यास एक तहखाने के साथ ही ज्ञानवापी हाता और आवास पर काबिज हुआ करते थे। काशी विश्वनाथ धाम के सुंदरीकरण के दौरान व्यास आवास के कुछ हिस्से को खरीदा भी गया था।
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ज्ञानवापी परिसर व्यास परिवार का हुआ करता था, ऐसा काशी में कहा जाता है। शहर के पुरनियों के अनुसार पं. बैजनाथ व्यास एक तहखाने के साथ ही ज्ञानवापी हाता और आवास पर काबिज हुआ करते थे। श्री काशी विश्वनाथ धाम के सुंदरीकरण की परियोजना शुरू हुई तो मंदिर प्रशासन को व्यास आवास खरीदने की जरूरत पड़ी।
पं. सोमनाथ व्यास और एक अन्य भाई के उत्तराधिकारी ने अपना हिस्सा बेच दिया, लेकिन आवास का अस्तित्व रहने तक पं. केदारनाथ व्यास वहीं रहे। भवन का कुछ हिस्सा गिरने पर प्रशासन ने नगर निगम, वीडीए और लोक निर्माण विभाग से सत्यापन कराया।
जर्जर पाए जाने पर भवन वर्ष 2017 में ढहा दिया गया। उसके बाद पं. केदारनाथ व्यास मंदिर के समीप स्थित एक किराये के भवन में रहे, जहां साल भर के भीतर उनकी मौत हो गई। भवन को लेकर मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट तक भी गया था।
व्यासपीठ की महत्ता का उल्लेख शास्त्रों में वर्णित
ज्ञानवापी की व्यास पीठ की महत्ता का उल्लेख शास्त्रों में भी मिलता है। यहां पंचक्रोशी समेत काशी की परंपरा से जुड़ी अन्य परिक्रमाओं के लिए संकल्प लिए जाते थे। ज्ञानवापी हाता स्थित व्यास परिवार का आवास भी कोई सामान्य भवन नहीं था। वहां से आदि शंकराचार्य से शास्त्रार्थ करने वाले मंडन मिश्र की यादें जुड़ी है। इसमें उनकी मूर्ति स्थापित थी और राधाकृष्ण का मंदिर भी था।
व्यास परिवार के आवास में कई विशिष्ट शख्सियत आई थीं
ज्ञानवापी स्थित व्यास परिवार के आवास में महात्मा गांधी के अलावा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित मोतीलाल नेहरू, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी समेत देश की कई अन्य विशिष्ट शख्सियतें आई हुईं थीं। काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी व्यास पीठ, ज्ञानकूप और ज्ञानवापी हाता के प्रबंधक रहे पं. केदारनाथ व्यास ने पंचकोशात्मक ज्योतिर्लिंग, काशी महात्म्य और अन्नपूर्णा कथा जैसी पुस्तकें लिखीं। उनकी पुस्तक काशी खंडोक्त पंचकोशात्मक यात्रा का 16 भाषाओं में अनुवाद हुआ है। स्थानीय लोग बताते हैं कि उनकी कई पांडुलिपियां और ग्रंथ उनका भवन ध्वस्त होने
के साथ ही उसमें समा गए।