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महामना ने पहले से ही बना लिया था मन
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Fri, 05 Aug 2016 02:41 AM IST
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तमाम रोचक तथ्यों को समेटे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के काशी में स्थापित होने की भी कहानी है। विश्वविद्यालय की परिकल्पना जब की गई थी, उस वक्त कई लोगों ने इसे दिल्ली में बनाने का प्रस्ताव रखा। महामना ने इसे नहीं माना। कारण, उनके मन में विश्वविद्यालय पहले से ही गंगा किनारे और हरियाली के बीच स्थापित हो चुका था। वह शिव की नगरी और मां गंगा किनारे बसी काशी को ही हिंदू विश्वविद्यालय के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थल मान चुके थे। अंतत: महामना के प्रस्ताव पर ही बनारस को बीएचयू की स्थापना के लिए चुना गया।
महामना हिंदू विश्वविद्यालय की रूपरेखा के साथ ही उसके शहर को लेकर भी सजग थे। उनकी स्पष्ट सोच थी कि विश्वविद्यालय गुरुकुल परंपरा का हो, जहां गुरुजनों के सानिध्य में ज्ञान अर्जन किया जाए। उन्होंने प्रयाग और काशी के बीच गंगा किनारे विश्वविद्यालय की स्थापना का मन बनाया। ऐसे में बनारस से बेहतर भला कौन सा शहर होता। भगवान भोले की नगरी, मोक्ष मार्ग प्रदर्शिका और हिंदुत्व की प्रेरणा से ओतप्रोत इस भूमि के कण-कण में भगवान का निवास है। खुद महामना ने कहा, बात महज विश्वविद्यालय की स्थापना तक सीमित नहीं। किताबी ज्ञान तो कहीं भी मिल सकता है लेकिन अलौकिक ज्ञान, परमात्मा से साक्षात्कार और हिंदुत्व का अनुभव काशी से बेहतर कहीं नहीं हो सकता। मां गंगा के किनारे बसे काशी से बेहतर इसके लिए शहर कोई दूजा नहीं हो सकता।
विश्वविद्यालय को काशी में स्थापित करने की एक और प्रमुख वजह थी हिंदुत्व। महामना हिंदुत्व को महज धर्म विशेष से ना जोड़कर उसे जीवन जीने की कला मानते थे। उन्होंने समिति के समक्ष कहा, सुविधा तो कई शहरों में मिल जाएगी लेकिन काशी धार्मिक और आध्यात्मिक राजधानी है। यह ज्ञानार्जन का सिरमौर है। यहां की माटी ही मोक्ष के लिए पर्याप्त है और यहां गुरुजनों का वास है। इतनी खूबियों वाला शहर भगवान भोले नाथ का भी प्रिय है। इससे बेहतर विकल्प भला क्या होगा। महामना का ये भी मानना था कि नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविख्यात भारतीय विद्या केंद्रों का काशी में पुनरुद्धार करने का उद्देश्य काशी में ही पूरा हो सकता है।
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गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति व बीएचयू के पुरातन छात्र व प्रोफेसर रहे प्रो. बीएम शुक्ला ने कहा कि महामना का दर्शन और उनका आशीर्वाद मुझे 1936 में मिला। उस वक्त मैं गवर्नमेंट जुबली हाईस्कूल के कक्षा छह में पढ़ता था। स्कूल के हेडमास्टर मालवीय जी महाराज के दामाद शंकर दत्त मालवीय थे। उस वक्त स्कूल के छात्रावास में 32 विद्यार्थी रहते थे। दिसंबर का महीना था। महामना अपने दामाद से मिलने आए थे। हॉस्टल वार्डन ने रात साढ़े नौ बजे सूचना दी, महामना आए हैं। जल्दी चलो उनके दर्शन कर लो। हम सभी विद्यार्थी उत्साहित हो गए। भागकर हेड मास्टर के घर पहुंचे। महामना आम के वृक्ष के बगल में खड़े थे। सिर से पैर तक सफेद वस्त्र पहने महामना की छवि देवतुल्य लग रही थी। बच्चों ने उनके चरण स्पर्श किए। उन्होंने हम सभी को तो आशीर्वाद दे दिया लेकिन अपने दामाद से कहा, इस ठंड में बच्चों को क्यों बुलाया? फिर हमसे कहा जाओ, फौरन छात्रावास जाओ। फिर हमें रोका और कहा, ‘हमेशा ये बात याद रखना। दूध पीयो, कसरत करो और नित्य हरिनाम जपो। हिम्मत से कारज करो, पूरेंगे सब काम।’ महामना की ये बात वर्षों बाद भी याद है। ये उन्हीं का आकर्षण था कि 1940 में छात्र के रूप में मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आया और तब से लगातार छह वर्षों तक महामना का दर्शन व आशीर्वाद प्राप्त होता रहा।
एक रोचक बात ये भी है कि उस वक्त आर्ट्स कॉलेज के हॉल में गीता प्रवचन होता था। महामना वृद्ध हो चुके थे लेकिन उस अवस्था में भी कुर्सी पर लाकर उन्हें मंच के किनारे बैठाया जाता था। उस वक्त हम विद्यार्थियों के बीच होड़ लगी रहती थी कि महामना के चरणों के पास कौन बैठे। उनके कपड़े के सफेद जूते पहने हुए पांव हम लोगों की पीठ को छूते रहें। इस प्रयत्न में हुई कई बार सफलता मिली। 1948 में रसायन विभाग में मैं लेक्चरर बना। यहीं रिसर्च ज्वाइन किया। पूरी विश्वविद्यालय में पहली जेके फेलोशिप मुझे मिली। आज हिंदू विश्वविद्यालय महामना के त्याग, दूरदर्शिता की ही देन है।
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महामना हिंदू विश्वविद्यालय की रूपरेखा के साथ ही उसके शहर को लेकर भी सजग थे। उनकी स्पष्ट सोच थी कि विश्वविद्यालय गुरुकुल परंपरा का हो, जहां गुरुजनों के सानिध्य में ज्ञान अर्जन किया जाए। उन्होंने प्रयाग और काशी के बीच गंगा किनारे विश्वविद्यालय की स्थापना का मन बनाया। ऐसे में बनारस से बेहतर भला कौन सा शहर होता। भगवान भोले की नगरी, मोक्ष मार्ग प्रदर्शिका और हिंदुत्व की प्रेरणा से ओतप्रोत इस भूमि के कण-कण में भगवान का निवास है। खुद महामना ने कहा, बात महज विश्वविद्यालय की स्थापना तक सीमित नहीं। किताबी ज्ञान तो कहीं भी मिल सकता है लेकिन अलौकिक ज्ञान, परमात्मा से साक्षात्कार और हिंदुत्व का अनुभव काशी से बेहतर कहीं नहीं हो सकता। मां गंगा के किनारे बसे काशी से बेहतर इसके लिए शहर कोई दूजा नहीं हो सकता।
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विश्वविद्यालय को काशी में स्थापित करने की एक और प्रमुख वजह थी हिंदुत्व। महामना हिंदुत्व को महज धर्म विशेष से ना जोड़कर उसे जीवन जीने की कला मानते थे। उन्होंने समिति के समक्ष कहा, सुविधा तो कई शहरों में मिल जाएगी लेकिन काशी धार्मिक और आध्यात्मिक राजधानी है। यह ज्ञानार्जन का सिरमौर है। यहां की माटी ही मोक्ष के लिए पर्याप्त है और यहां गुरुजनों का वास है। इतनी खूबियों वाला शहर भगवान भोले नाथ का भी प्रिय है। इससे बेहतर विकल्प भला क्या होगा। महामना का ये भी मानना था कि नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविख्यात भारतीय विद्या केंद्रों का काशी में पुनरुद्धार करने का उद्देश्य काशी में ही पूरा हो सकता है।
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गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति व बीएचयू के पुरातन छात्र व प्रोफेसर रहे प्रो. बीएम शुक्ला ने कहा कि महामना का दर्शन और उनका आशीर्वाद मुझे 1936 में मिला। उस वक्त मैं गवर्नमेंट जुबली हाईस्कूल के कक्षा छह में पढ़ता था। स्कूल के हेडमास्टर मालवीय जी महाराज के दामाद शंकर दत्त मालवीय थे। उस वक्त स्कूल के छात्रावास में 32 विद्यार्थी रहते थे। दिसंबर का महीना था। महामना अपने दामाद से मिलने आए थे। हॉस्टल वार्डन ने रात साढ़े नौ बजे सूचना दी, महामना आए हैं। जल्दी चलो उनके दर्शन कर लो। हम सभी विद्यार्थी उत्साहित हो गए। भागकर हेड मास्टर के घर पहुंचे। महामना आम के वृक्ष के बगल में खड़े थे। सिर से पैर तक सफेद वस्त्र पहने महामना की छवि देवतुल्य लग रही थी। बच्चों ने उनके चरण स्पर्श किए। उन्होंने हम सभी को तो आशीर्वाद दे दिया लेकिन अपने दामाद से कहा, इस ठंड में बच्चों को क्यों बुलाया? फिर हमसे कहा जाओ, फौरन छात्रावास जाओ। फिर हमें रोका और कहा, ‘हमेशा ये बात याद रखना। दूध पीयो, कसरत करो और नित्य हरिनाम जपो। हिम्मत से कारज करो, पूरेंगे सब काम।’ महामना की ये बात वर्षों बाद भी याद है। ये उन्हीं का आकर्षण था कि 1940 में छात्र के रूप में मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आया और तब से लगातार छह वर्षों तक महामना का दर्शन व आशीर्वाद प्राप्त होता रहा।
एक रोचक बात ये भी है कि उस वक्त आर्ट्स कॉलेज के हॉल में गीता प्रवचन होता था। महामना वृद्ध हो चुके थे लेकिन उस अवस्था में भी कुर्सी पर लाकर उन्हें मंच के किनारे बैठाया जाता था। उस वक्त हम विद्यार्थियों के बीच होड़ लगी रहती थी कि महामना के चरणों के पास कौन बैठे। उनके कपड़े के सफेद जूते पहने हुए पांव हम लोगों की पीठ को छूते रहें। इस प्रयत्न में हुई कई बार सफलता मिली। 1948 में रसायन विभाग में मैं लेक्चरर बना। यहीं रिसर्च ज्वाइन किया। पूरी विश्वविद्यालय में पहली जेके फेलोशिप मुझे मिली। आज हिंदू विश्वविद्यालय महामना के त्याग, दूरदर्शिता की ही देन है।