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राजनीति के पुरोधा : राजभवन त्याग झोपड़ी में रहे राज्यपाल टीएन सिंह

Sun, 22 Jan 2017 12:32 PM IST
अनूप ओझा, अमर उजाला, वाराणसी
अनूप ओझा, अमर उजाला, वाराणसी Updated Sun, 22 Jan 2017 12:32 PM IST
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Governor TN Singh lived in a hut
tn singh - फोटो : अमर उजाला
बनारस की गलियों में मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों और केंद्र, राज्य सरकारों में मंत्री रह चुके राजनेताओं नाम-पते गुमनाम हो चुके हैं। यूपी के सीएम, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में केंद्रीय उद्योग, पूर्ति तथा लौह और इस्पात मंत्री रहे त्रिभुवन नारायण सिंह के घर का पता शुक्रवार को उनके पड़ोसी ही नहीं बता सके।
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ईश्वरगंगी मुहल्ले के ज्यादातर लोगों को पता नहीं है कि वहां कोई सीएम निवास भी है। समाजवाद के प्रवर्तक डॉ. राम मनोहर लोहिया को अविभाजित वाराणसी की चंदौली सीट से पराजित करने वाले गांधीवादी नेता टीएन सिंह ने पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनने के बाद राजभवन में रहने से इनकार कर दिया था। तब उनके लिए झोपड़ी(कॉटेज) बनाई गई थी, जो अब कोलकाता में पर्यटन स्थल के रूप में मशहूर हो चुकी है। 
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 काशी की गलियों से निकलकर देश के राजनीतिक क्षितिज पर छाने वाले राजनेताओं में त्रिभुवन नारायण सिंह का नाम सादगी, राष्ट्रसेवा और ईमानदारी के लिए हमेशा याद किया जाएगा। बताते हैं कि वह सत्ताशीर्ष पर पहुंचने के बाद भी बनारस आते थे तो कोई तामझाम नहीं होता था।
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वह गली-मुहल्ले में पैदल ही घूमने और लोगों का हालचाल जानने निकल जाते थे। 18 अक्तूबर 1970 को सूबे के सीएम की कुर्सी संभालने के 15 दिन बाद जब वह ईश्वरगंगी अपने घर आए थे, तब भी उनके दरवाजे जनता के लिए बिना रोटकोट मिलने के लिए खोल दिए गए थे।

उनके पौत्र अतुल नारायण सिंह बताते हैं कि बाबा के घर आने से पहले ही मुहल्ला पुलिस छावनी बन गया था लेकिन घर आने के बाद उन्होंने यहां से गारद भी हटवा दी। अफसरों से उन्होंने कहा कि यहां कौन आने पाएगा? मुहल्ले के लोग ही काफी हैं। तब बरामदे में देर रात तक उन्होंने जनता की समस्याएं सुनी थी।
 

पश्चिम बंगाल सरकार ने खपरैल की एक झोपड़ी बनवाई थी

Governor TN Singh lived in a hut
ex up cm tn singh - फोटो : अमर उजाला
उनकी सबसे पड़ी पुत्री उमा के पुत्र शशांक सिंह किसी जमाने में उनकी गोद में खेल चुके हैं। वह बताते हैं कि अपनी आंखों देखी एक घटना का जिक्र करते हुए भावुक हो उठते हैं। बताते हैं कि नाना 1977 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बने थे।

शपथ लेने के बाद उन्होंने राजभवन की सुख-सुविधाओं के बीच रहने से इनकार कर दिया। उनके इस फैसले से शीर्ष अफसर हैरान थे। बहुत मान मनौव्वल के बाद वह कॉटेज में रहने के लिए राजी हुए। तब उनके लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने खपरैल की एक झोपड़ी बनवाई थी, जिसे आज भी पर्यटक देखने जाते हैं। वह उनकी सादगी, ईमानदारी के ऐसे कई दृष्टांत बताते हैं।

शशांक कहते हैं कि राज्यपाल पद से हटने के बाद नाना ट्रेन से आए थे। कैंट स्टेशन पर उतरने के बाद वह रिक्शे से ही घर पहुंचे। सरकारी बंगला-कार नहीं ली थी। अब ईश्वरगंगी में उस दौर के सीएम निवास को लोग जानते तक नहीं।

शनिवार को उनके घर का पता पूछने और वहां तक पहुंचने में अमर उजाला टीम को काफी मशक्कत करनी पड़ी। वह उस दौर में जिस कमरे में रहते और फरियाद सुनते थे। उस पर ताला जड़ा था। अतुल ने कमरा खोलवाया तो उसमें कुछ कुर्सियां मिलीं। महीनों से उस कक्ष में झाड़ू तक नहीं लगा था। 

 
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