तस्वीरों में स्वर्णमयी काशी के दर्शन: विश्वनाथ में लगा है 940 किलो सोना, कहीं खजाना बांटती हैं मां अन्नपूर्णा
काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ के मंदिर में साढ़े तेइस मन (940 किलोग्राम) सोना लगा है। मंदिर के शिखर से गर्भगृह तक स्वर्णिम आभा श्रद्धालुओं पर भी बरस रही है। महाराजा रणजीत सिंह ने 1853 में 22 मन सोना मंदिर को दान किया था।
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भगवान शिव की नगरी काशी भी उनकी तरह ही अनंत है। परंपराओं को सहेजे हुए हर दिन नई कहानी बुनती है। काशी में भगवान और भक्त दोनों के स्वर्ण मंदिर हैं। मां अन्नपूर्णा और महालक्ष्मी की स्वर्ण प्रतिमा भी विराजमान है। हर साल मां अन्नपूर्णा भक्तों को अन्न-धन का वरदान देकर अपना खजाना लुटाती हैं। इस बार धनतेरस पर श्री काशी विश्वनाथ, माता अन्नपूर्णा और मणिमंदिर में 10 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आने की संभावना है।
काशी विश्वनाथ मंदिर में 940 किलोग्राम सोना
काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ के मंदिर में साढ़े तेइस मन (940 किलोग्राम) सोना लगा है। मंदिर के शिखर से गर्भगृह तक स्वर्णिम आभा श्रद्धालुओं पर भी बरस रही है। महाराजा रणजीत सिंह ने 1853 में 22 मन सोना मंदिर को दान किया था। इससे पूरा शिखर स्वर्णमंडित कराया गया। बाबा का छत्र भी स्वर्ण से मंडित है। महाराजा रणजीत सिंह ने विश्वनाथ मंदिर के दो शिखरों को स्वर्णमंडित कराया था। इसके 187 साल बाद करीब 60 किलोग्राम स्वर्ण से मंदिर के गर्भगृह को भी स्वर्णमंडित कराया जा चुका है। आंकड़ों के अनुसार एक मन में 40 किलो होता है।
काशी का दूसरा स्वर्ण मंदिर सीरगोवर्धन है। श्रद्धालुओं के सहयोग से मंदिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार स्वर्ण मंडित कराया जा चुका है। चौखट और दरवाजे पर सोने की परत चढ़ाई गई है। मंदिर के शिखर का कलश और मंदिर में मौजूद संत रविदास की पालकी से लेकर छत्र तक सब कुछ सोने का है। संत रविदास मंदिर में 130 किलो सोने की पालकी रखी हुई है। पालकी साल में एक बार जयंती के दिन निकाली जाती है। इस मंदिर का निर्माण 1965 में हुआ था। पहला स्वर्ण कलश 1994 में संत गरीब दास ने संगत के सहयोग से चढ़ाया था। बाद में श्रद्धालुओं ने इसे 32 स्वर्ण कलशों से सुशोभित किया। वर्ष 2012 में 35 किलो सोने का स्वर्ण दीपक बनवाया गया। एक भक्त ने संगत कर मंदिर में 35 किलोग्राम सोने का छत्र लगवाया है। पूरे मंदिर में 200 किलो से ज्यादा सोना मौजूद है।
बाबा विश्वनाथ को अन्न की भिक्षा देने वाली मां अन्नपूर्णा के स्वर्ण प्रतिमा के दर्शन धनतेरस पर होते हैं। वर्ष में एक बार भक्त माता के स्वर्णमयी स्वरूप के दर्शन कर अन्न-धन का आशीर्वाद लेते हैं। मंदिर के महंत शंकर पुरी का कहना है कि माता की यह प्रतिमा लगभग 422 साल पुरानी है। वर्ष 1601 में तत्कालीन महंत केशव पुरी के समय भी देवी के इस विग्रह के पूजन का प्रमाण उपलब्ध है। यह पहला मौका होगा, जब माता की स्वर्णमयी प्रतिमा के पांच दिनों तक दर्शन होंगे। इस साल खजाने के रूप में श्रद्धालुओं को पांच लाख रुपये से अधिक बांटे जाएंगे।
केदारखंड में धर्मसम्राट करपात्री जी महाराज की कर्मस्थली धर्मसंघ में भक्तों पर मां महालक्ष्मी की कृपा बरसेगी। मणिमंदिर में मां महालक्ष्मी की एक क्विंटल वजन की स्वर्ण प्रतिमा है। धनतेरस पर माता के भव्य स्वरूप के विशेष दर्शन होंगे। माता के दरबार में दर्शन करने वालों को माता के दरबार से खजाना का प्रसाद वितरित किया जाएगा। धर्मसंघ के महामंत्री जगजीतन पांडेय ने बताया कि इस बार धनतेरस पर एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आने की संभावना है। इसके अनुसार ही मंदिर में इंतजाम किए जा रहे हैं। माता लक्ष्मी की तीन फीट की स्वर्ण प्रतिमा का वजन एक क्विंटल है। पांच दिन तक श्रद्धालु माता के विशेष दर्शन कर सकेंगे।