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जिया मोरा डरपाए घन गरजत बरसत आए...
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Fri, 08 Jul 2016 02:15 AM IST
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मेघ और मल्हार दोनों विरह रूपी एक ही नदी के दो किनारे हैं। इनकी पीड़ा का स्रोत एक ही है लेकिन प्रवाह अलग-अलग मिलते हैं। वह कभी घटाओं में तो कभी बिजली की तड़क-चमक के रूप में उठती है। यही वजह है कि जब घनघोर घटाएं घिर जाती हैं। बादल उमड़ने, घुमड़ने लगते हैं तब पिया की याद सताने लगती है। झुंड-झुंड बनाकर आते कजरारे बादलों को देख घनश्याम के न आने का दर्द छलकने लगता है। वह वर्षों का इंतजार भी होता है और इकरार भी। यह कहना है ठुमरी गायिका पद्म विभूषण गिरिजा देवी का।
बनारसी ठुमरी को पूरब अंग की खास शैली के रूप में स्थापित करने वाली ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी रागों की ताकत को अचूक मानती हैं। वह कहती हैं कि स्वरों में ऐसी शक्ति होती है कि अगर उन्हें शुद्धता से लगा दिया जाए तो चमत्कार हो सकता है। राग मेघ या मल्हार के सुरों की अलापचारी से घटाओं का एहसास कराया जा सकता है। वह कहती हैं कि मेघ ठीक से गा दिया जाए तो बादल उमड़ने लगेंगे।
वह कहती हैं कि आषाढ़ के मेघ विरह की याद दिलाते हैं। विरह वैसे तो चैत से ही शुरू हो जाता है। दरअसल माघ के बाद फागुन बीतते ही चैत से लोग नौकरी की तलाश में घर छोड़कर परदेस जाने लगते हैं। ऐसे में प्रियतम को लेकर विरह की व्याकुलता उसी समय से भर जाती है। आषाढ़ में ऋतु जब बदलती है और मेघ उमड़ने , घुमड़ने लगते हैं तब पिया के मिलन की आतुरता बढ़ जाती है।
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यही वजह है कि मल्हार और कजरी गाई जाने लगती है। प्रकृति के निखरते रूप को देखकर विरहिन की यह व्याकुलता सहज है। वह अपनी पसंदीदा ठुमरी की बंदिश पर अलाप लेती हैं- बैठी सोचें बृज बाम/ सूना लागे मेरो धाम/ नहिं आए घनश्याम/ घेरि आई बदरी....। इसके बाद वह दूसरी बंदिश पर सुर लगाने लगती हैं-बरसन लागे बदरयिा रूम -झूम के। वह कहती हैं कि जरा सोचिए, जब कोई नई नवेली दुल्हन घर में अकेली हो, उसका पति परदेस में कमाने गया हो और बादल घिर कर गरजने, बरसने लगें, बिजुरी चमकने लगे तो उसे डर लगेगा कि नहीं।
अप्पा जी फिर बर्षा बहार की बंदिश गुनगुनाती हैं-हे मां कारी बदरिया बरसे पिया नहिं आए/ ज्यों ज्यों पपीहा पिउ िपउ रटत है सूनी सेज मोरा जिया तरसे...। इसके बाद वह ख्याल की एक बंदिश उठाती हैं-जिया मोरा डरपाए घन गरजत बरसत आए.... आप तो जाए द्वारिका छाए/ बृज डूबत कौन बचाए...। प्रियतम के विरह की जो पुकार मेघ मल्हार में दिखती है, वह दूसरे रागों में नहीं मिलती।
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बनारसी ठुमरी को पूरब अंग की खास शैली के रूप में स्थापित करने वाली ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी रागों की ताकत को अचूक मानती हैं। वह कहती हैं कि स्वरों में ऐसी शक्ति होती है कि अगर उन्हें शुद्धता से लगा दिया जाए तो चमत्कार हो सकता है। राग मेघ या मल्हार के सुरों की अलापचारी से घटाओं का एहसास कराया जा सकता है। वह कहती हैं कि मेघ ठीक से गा दिया जाए तो बादल उमड़ने लगेंगे।
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वह कहती हैं कि आषाढ़ के मेघ विरह की याद दिलाते हैं। विरह वैसे तो चैत से ही शुरू हो जाता है। दरअसल माघ के बाद फागुन बीतते ही चैत से लोग नौकरी की तलाश में घर छोड़कर परदेस जाने लगते हैं। ऐसे में प्रियतम को लेकर विरह की व्याकुलता उसी समय से भर जाती है। आषाढ़ में ऋतु जब बदलती है और मेघ उमड़ने , घुमड़ने लगते हैं तब पिया के मिलन की आतुरता बढ़ जाती है।
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यही वजह है कि मल्हार और कजरी गाई जाने लगती है। प्रकृति के निखरते रूप को देखकर विरहिन की यह व्याकुलता सहज है। वह अपनी पसंदीदा ठुमरी की बंदिश पर अलाप लेती हैं- बैठी सोचें बृज बाम/ सूना लागे मेरो धाम/ नहिं आए घनश्याम/ घेरि आई बदरी....। इसके बाद वह दूसरी बंदिश पर सुर लगाने लगती हैं-बरसन लागे बदरयिा रूम -झूम के। वह कहती हैं कि जरा सोचिए, जब कोई नई नवेली दुल्हन घर में अकेली हो, उसका पति परदेस में कमाने गया हो और बादल घिर कर गरजने, बरसने लगें, बिजुरी चमकने लगे तो उसे डर लगेगा कि नहीं।
अप्पा जी फिर बर्षा बहार की बंदिश गुनगुनाती हैं-हे मां कारी बदरिया बरसे पिया नहिं आए/ ज्यों ज्यों पपीहा पिउ िपउ रटत है सूनी सेज मोरा जिया तरसे...। इसके बाद वह ख्याल की एक बंदिश उठाती हैं-जिया मोरा डरपाए घन गरजत बरसत आए.... आप तो जाए द्वारिका छाए/ बृज डूबत कौन बचाए...। प्रियतम के विरह की जो पुकार मेघ मल्हार में दिखती है, वह दूसरे रागों में नहीं मिलती।