फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Former Hindi Department Head of BHU Proffesor Chauthiram is no more

आलोचना के एक युग का अवसान: हिंदी के जनबुद्धिजीवी थे प्रो. चौथीराम, उनका निधन हिंदी साहित्य की अपूरणीय क्षति है

Mon, 13 May 2024 04:11 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Mon, 13 May 2024 04:11 PM IST
सार

Varanasi News: तबीयत बिगड़ने के 15 मिनट के अंदर ही सबकुछ हो गया। उनके निधन पर साहित्यकार डॉ. इंदीवर पांडेय, डॉ. मधुकर मिश्र, नवगीतकार सुरेंद्र वाजपेयी, डॉ. जितेंद्र नाथ मिश्र आदि ने शोक संवेदना प्रकट करते हुए कहा कि यह हिंदी साहित्य की अपूरणीय क्षति है।

विज्ञापन
Former Hindi Department Head of BHU Proffesor Chauthiram is no more
प्रोफेसर चौथी राम यादव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और हिंदी के आलोचक प्रो. चौथीराम यादव का रविवार को निधन हो गया। वह 86 वर्ष के थे। सांस लेने में दिक्कत के बाद परिजनों ने उन्हें शहर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां शाम 6:30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। पार्थिव देह का अंतिम संस्कार सोमवार को सुबह हरिश्चंद्र घाट पर किया जाएगा। वह अपने पीछे पांच बेटों और बहुओं का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं।

विज्ञापन


प्रो. चौथीराम के निधन के साथ हिंदी साहित्य जगत को झटका लगा है। साहित्यकारों ने उन्हें हिंदी का जनबुद्धिजीवी बताते हुए उनके निधन को हिंदी आलोचना के एक युग का अवसान करार दिया है। जौनपुर जिले की शाहगंज तहसील के कायमगंज गांव निवासी प्रो. चौथीराम 2003 में बीएचयू से सेवानिवृत्त हुए थे। उनके तीसरे पुत्र और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के प्रो. अनुराग यादव ने बताया कि पिताजी बिल्कुल ठीक थे। 
विज्ञापन


सामाजिक परिवर्तन के लिए छोड़ी अमिट छाप
जयपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विशाल विक्रम सिंह ने कहा कि प्रो. चौथीराम एक ऐसे आलोचक थे, जो सामाजिक परिवर्तन के लिए साहित्य और साहित्य के लिए सामाजिक परिवर्तन के दृष्टिकोण से आलोचना करते थे। वह मार्क्सवादी और आंबेडकर दोनों दृष्टिकोणों के समन्वित रूप से हिंदी आलोचना में प्रवृत्त थे। उनके लेखन का 70 फीसदी हिस्सा रिटायरमेंट के बाद पाठकों के सामने आया। बनारस के साहित्य के प्रतीक काशीनाथ सिंह ने अपनी किताब काशी का अस्सी में भी प्रो. चौथीराम का जिक्र किया है।

विज्ञापन
विज्ञापन

आलोचना की ठसक आवाज शांत

बीएचयू हिंदी विभाग के प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल कहते हैं कि हिंदी आलोचना की एक ठसक भरी आवाज शांत हो गई। एक भरपूर, स्वाधीन और सक्रिय साहित्यिक जीवन जीते हुए प्रो. चौथीराम यादव ने इस जीवन को अलविदा कहा। एक बौद्धिक के साथ वे आंदोलन धर्मी रहे और स्त्री व दलित से जुड़े आंदोलनों में सक्रिय भी रहे। हाशिए के समाज से लेकर समाज के हाशिए तक को समझने में उनकी समान गति थी। 

भक्तिकाल में कबीर और आधुनिक काल में हजारी प्रसाद द्विवेदी से जुड़कर उनकी आलोचना का विकास हुआ। बौद्धिक स्तर पर बुद्ध और आंबेडकर को एक साथ समझते थे। तकनीकी की दुनिया में भी गजब की रुचि थी। कह सकते हैं वह कि जीवन का पोर-पोर जीते थे।

आचार्य परंपरा की अंतिम कड़ी थे प्रो. चौथीराम
साहित्यकार डॉ. राम सुधार सिंह कहते हैं कि प्रो. चौथीराम यादव काशी की आचार्य परंपरा के अंतिम कड़ी थे। विद्वता के साथ-साथ उनका सहज व्यक्तित्व उन्हें सबसे अलग करता था। भक्ति काल को नए ढंग से देखने की उनके अंदर समझ थी। सेवानिवृत्ति के बाद भी वह सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भागीदारी करते थे।

कई सम्मान से नवाजे गए थे प्रो. चौथीराम
प्रो. चौथीराम यादव को साहित्य साधना सम्मान, लोहिया साहित्य सम्मान, कबीर साहित्य सम्मान समेत कई सम्मान से सम्मानित किया गया। उनकी प्रमुख कृतियों में छायावादी काव्य : एक दृष्टि, मध्यकालीन भक्तिकाव्य में विराहनुभूति की व्यंजना, हिंदी के श्रेष्ठ रेखाचित्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी का समग्र पुनरावलोकन, लोक और वेद आमने-सामने आदि शामिल हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed