बलिया के डॉ. अनिल भी हैं कोरोना की दवा बनाने वालों में, बीएचयू को किया गौरवान्वित, फ्रांस-अमेरिका में रहे वैज्ञानिक
- अंतिम बार वर्ष 2018 में आए थे गांव, इस उपलब्धि से गदगद हैं जनपद वासी, बधाइयों का लगा तांता।
- डॉ अनिल कुमार मिश्रा 22 छात्रों को करा चुके हैं पीएचडी, उनके 270 से अधिक शोध पत्र हो चुके हैं प्रकाशित।
- बतौर वैज्ञानिक फ्रांस और अमेरिका में भी रह चुके हैं तीन-तीन वर्ष तक।
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कोरोना के इलाज में गेम चेंजर दवा टू डीजी बनाने वालों में शामिल जिले के लाल डॉ. अनिल कुमार मिश्रा सिकंदरपुर के मिश्र चक निवासी हैं। उनकी उपलब्धि से जिले में हर्ष का माहौल है। इसके पूर्व सिकंदरपुर क्षेत्र के लीलकर गांव निवासी डॉ संजय राय ने कोवैक्सीन के मामले में प्रमुख भूमिका निभाई थी।
सिकंदरपुर से दो किमी दूर पर स्थित छोटे से गांव मिश्रचक निवासी डॉ. अनिल कुमार मिश्रा ने कक्षा एक से आठवीं तक की पढ़ाई जूनियर हाई स्कूल सिकंदरपुर में की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वे गोरखपुर चले गए। 1984 में उन्होंने एमएससी(रसायन विज्ञान) की पढ़ाई गोरखपुर विश्वविद्यालय से की। 1988 में उन्होंने बीएचयू से पीएचडी की। इस बाद वह तीन साल तक पोस्ट डॉक्टोरल फेलो के साथ प्रोफेसर रॉजर गुइलार्ड के साथ बर्गोग्ने विश्वविद्यालय, डीजन, फ्रांस में और प्रोफेसर सीएफ मेयर्स, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय और डेविस, यूएसए के साथ रहे। वह 1994- 1997 तक इनसेरम, नैनटेस, फ्रांस में प्रोफेसर चटल के साथ अनुसंधान वैज्ञानिक रहे।
इसके अलावा वह मैक्स-प्लैंक इंस्टीट्यूट, जर्मनी में हेड और अतिरिक्त निदेशक इनमास और विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे। 1997 से वरिष्ठ वैज्ञानिक के रूप में वे इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज, डीआरडीओ, में शामिल हुए थे। उनके मार्ग दर्शन में 22 छात्रों ने पीएचडी की। उनके 270 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ मिश्रा को कई पुरस्कार मिले हैं। उनमें 1999 में भारत के प्रधान मंत्री द्वारा डीआरडीओ के यंग साइंटिस्ट का प्रतिष्ठित पुरस्कार भी शामिल है। उनकी शोध रुचि रेडियोमेकैमिस्ट्री, मेटल केमिस्ट्री, रेडियो फार्मास्युटिकल साइंस और विशिष्ट आणविक इमेजिंग जांच का विकास रही है।
पीएचडी करते समय हुआ था बड़ा हादसा
नवानगर। डॉ. अनिल कुमार मिश्रा पांच भाई और एक बहन थे। बीएचयू से पीएचडी के दौरान उनके परिवार में बड़ा हादसा हुआ, जिसमें उनके पिता विजय शंकर मिश्रा और चौथे नंबर के अनुज अजय कुमार मिश्रा की करंट लगने से मौत हो गई। इस घटना से डॉ मिश्रा की काफी सदमे में रहे। बावजूद इसके उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की, जिसकी बदौलत आज पूरा देश उन पर गर्व कर रहा है। उनकी माता सुशीला मिश्रा ने बताया कि वह कहीं रहे फोन से हमेशा बात करता है। विदेश में रहने के दौरान भी मेरा हालचाल लेते रहता था। गांव में दो-तीन लोगों के पास ही उनका नंबर है। अपने मित्रों को उन्होंने बता रखा है कि रिसर्च के दौरान उन्हें परेशान न करें। डॉक्टर मिश्रा की माता उनके छोटे अनुज सुधीर कुमार मिश्रा (अध्यापक) के साथ सिकंदरपुर जूनियर हाई स्कूल के पास बने नए मकान में रहती हैं।
सहज व्यक्तित्व के धनी हैं डॉ एके मिश्रा
नवानगर। गांव के कन्हैया खरवार बताते है कि डाक्टर साहब बहुत ही सरल स्वभाव के है, वह जब भी गांव आते हैं तो सभी लोगों से सहजता से मिलते-जुलते है। प्रसिद्ध नारायण मिश्रा ने बताया कि डॉक्टर साहब कई सालों पर गांव आते हैं, लेकिन जब भी आते है तो उनसे मिलने वालों का तांता लगा रहता है। गांव के ही भुसुंडी पांडे बताते है कि इतनी उपलब्धि हासिल करने के बावजूद डाक्टर साहब अपनी मातृ भाषा भोजपुरी को नहीं भूलें है। गांव में अपने मित्रों से वह भोजपुरी में ही बात करते हैं। गांव ही नहीं आसपास के क्षेत्र के लोग भी उनका बहुत सम्मान करते हैं।
बधाई देने वालों का लगा तांता
डॉ. अनिल मिश्रा द्वारा कोरोना के इलाज में गेम चेंजर दवा टू डीजी बनाने की खबर मिलने के बाद लोगों द्वारा उनके भाइयों को फोन कर और उनके दरवाजे पर जाकर बधाई देने का तांता लग गया। उनके भाइयों से मिल कर लोग उनके माध्यम से डॉक्टर साहब को बधाई देने की बात कहते नजर आए।
पिता विजय शंकर थे अध्यापक
नवानगर। डा. अनिल कुमार मिश्रा के पिता स्व. विजय शंकर मिश्रा अध्यापक थे। डा. मिश्रा पांच भाई और एक बहन में से दूसरे नंबर के हैं। बड़े भाई अशोक मिश्रा, संदवापुर इंटर कॉलेज में प्रवक्ता हैं। तीसरे भाई अरुण कुमार मिश्रा गांव पर ही खेती कराते हैं। चौथे भाई स्व. अजय कुमार मिश्रा, पांचवे भाई सुधीर कुमार मिश्रा, जूनियर हाईस्कूल सिकंदरपुर में अध्यापक पद पर कार्यरत हैं। सबसे छोटी बहन बीना द्विवेदी की शादी हो चुकी है।
अंतिम बार वर्ष 2018 में आए थे गांव
डॉ एके मिश्रा अक्सर बाहर ही रहते है। वर्ष 2018 के सात मई को अपने चचरे पौत्र असित कुमार मिश्रा के वैवाहिक कार्यक्रम में शामिल होने गांव आए थे। तब वह एक सप्ताह तक गांव रहे और अपने बचपन के दोस्तों के अलावा शुभचिंतकों से भी मुलाकात की थी। उसके बाद वह गांव नहीं आए। हालांकि उनके द्वारा कोरोना के इलाज के लिए दवा बनाने की खबर जरूर आई, जिसने उनके मित्रों और शुभचिंतकों को प्रफुल्लित कर दिया।