अल-नीनो: घटते आयात व कम पैदावार के चलते महंगी हो सकती हैं दालें, कीमत वृद्धि रोकने के लिए सरकार ने कसी कमर
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में दालों का आयात कीमतों पर दबाव डाल सकता है। कमजोर बारिश के कारण चालू खरीफ सीजन में दालों का रकबा पिछले साल के मुकाबले 27 हजार हेक्टेयर कम हुआ है। दालों की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए सरकार ने बनाया 30 लाख टन का बफर स्टॉक बनाया है। आइए इस बारे में विस्तार से जानें।
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अल-नीनो के खतरे के कारण घरेलू उत्पादन में गिरावट की चिंताओं के बीच दालों के घटते आयात ने महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ा दिया है। इतना ही नहीं निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट ने 70 फीसदी सूखे की आशंका जताई है, जो व्यापारियों के साथ ही साथ उपभोक्ताओं के लिए भी चिंताजनक है। हालांकि सरकार का कहना है कि दालों का पर्याप्त स्टॉक मौजूद होने के कारण घबराने की आवश्यकता नहीं है।
कैलेंडर वर्ष 2026 के पहले छह महीनों में भारत का दाल आयात घटकर 31.80 लाख टन रह गया, जो एक साल पहले के 32.27 लाख टन से 1.46 पुीसदी कम है। इस अवधि के दौरान तुअर का आयात 5.05 लाख टन रहा। अधिकांश आपूर्ति मोजाम्बिक, तंजानिया और सूडान जैसे अफ्रीकी उत्पादक देशों से हुई। इस वर्ष जनवरी-जून के दौरान मोजाम्बिक 1.83 लाख टन से अधिक आपूर्ति के साथ तुअर का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रहा। इसके बाद म्यांमार से 1.23 लाख टन, तंजानिया से 1.01 लाख टन और सूडान से लगभग 49,049 टन दाल का आयात हुआ।
देश में प्रति वर्ष कुल दलहन उत्पादन 256.83 लाख टन है। इसमें सबसे ज्यादा हिस्सा चना दाल का करीब 40 फीसदी है। अरहर दाल का उत्पाद 15 से 20 फीसदी, जबकि उड़द व मूंग का 8 से 10 फीसदी हिस्सा है।
कमजोर मानसून से घटा रकबा
- कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 14 अगस्त तक देशभर में 108.14 लाख हेक्टेयर में दलहन फसलों की बुआई हो चुकी है। पिछले साल यह आंकड़ा 108.49 लाख हेक्टेयर था। इस लिहाज से दलहन का रकबा पिछले साल के मुकाबले 35 हजार हेक्टेयर कम है। तुअर और मूंग की बुआई सबसे पीछे चल रही है। अरहर का रकबा अब तक 40.31 लाख हेक्टेयर है, जो पिछले साल के 42.01 लाख हेक्टेयर की तुलना में 1.69 लाख हेक्टेयर कम है।
- मूंग का रकबा 32.05 लाख हेक्टेयर है, जो पिछले साल के 33.42 लाख हेक्टेयर से 1.37 लाख हेक्टेयर कम है। उड़द, कुल्थी और मोंठ का रकबा पिछले साल के मुकाबले अधिक होने से दलहन के कुल रकबे की कमी का अंतर कम हुआ है।
- अन्य दालों का रकबा 14 अगस्त तक 3.14 लाख हेक्टेयर है, जो पिछले साल के 3.40 लाख हेक्टेयर से 27 हजार हेक्टेयर पीछे है।
मुख्य चिंता पैदावार से जुड़ी
खरीफ दालों की बुवाई 108 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जो अच्छी रिकवरी दर्शाती है। हालांकि, मुख्य चिंता प्रति हेक्टेयर पैदावार को लेकर है। दालों की फसल को बीच के चरण में अच्छी बारिश की जरूरत होती है। अगस्त के अंत से सितंबर तक अल नीनो के मजबूत होने के संकेत हैं, जिसका सीधा नकारात्मक असर दालों की उत्पादकता पर पड़ सकता है।
कीमतों पर पड़ रहा असर
कुंवर जी ग्रुप के डायरेक्टर व हेड ऑफ रिसर्च रवि देवड़ा का कहना है कि हाल के दिनों में चना 6,100 से बढ़कर 6,400 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया था। उड़द और तुअर की कीमतें भी बढ़ी हैं, लेकिन ऊंचे आयात के कारण तुअर की कीमतों में एक सीमा तक ठहराव देखा गया। त्योहारी सीजन के दौरान मांग बढ़ेगी। जिससे कीमतें बढ़ सकती हैं।
महंगाई पर लगाम लगाने की तैयारी
केंद्र सरकार आगामी त्योहारी सीजन को देखते हुए दालों की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए पूरी तरह सतर्क है। सरकार ने लगभग 30 लाख टन दालों का बफर स्टॉक तैयार किया है। जरूरत पड़ने पर बफर स्टॉक से बाजार में दालों की आपूर्ति की जाएगी। इस बफर स्टॉक में अरहर, उड़द, मूंग, चना और मसूर शामिल हैं। सरकार बाजार की कीमतों पर लगातार नजर रखे हुए है। जैसे ही कीमतों में असामान्य तेजी दिखेगी, तय अंतराल और योजनाबद्ध तरीके से दालों को बाजार में उतारा जाएगा।