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गंगा में अठखेलियां करती दिखेंगी डॉल्फिन, बनारस में गंगाजल की गुणवत्ता में हो रहा सुधार

Sat, 06 Feb 2021 02:30 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Sat, 06 Feb 2021 02:30 PM IST
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Dolphins will be seen in the Ganges water quality is improving in Banaras 
डॉल्फिन - फोटो : अमर उजाला

एक पल के लिए पानी से बाहर आना और गायब हो जाना। अठखेलियां करती डॉल्फिन (सूंस) को देखने के लिए हमें कितनी मशक्कत करनी पड़ती है। माना जाता है कि डॉल्फिन दो से तीन मिनट में सांस लेने के लिए पानी से ऊपर कूदती है। ऐसा गंगाजल की गुणवत्ता में सुधार होने से संभव हो सका है। डॉल्फिन प्रेमियों और नदी विज्ञानियों के लिए गंगाजल की गुणवत्ता में सुधार एक राहत भरी खबर है। काशी के गंगा बेसिन में अब पर्यटकों को आसानी से गंगा डॉल्फिन के दर्शन हो सकेंगे। गंगा प्रहरियों के अनुसार, मणिकर्णिका से कैथी तक 100 से अधिक डॉल्फिन होने का अनुमान है।

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ईको टूरिज्म के लिहाज से विकसित डॉल्फिन प्वाइंट ढाका को अर्थ गंगा की अवधारणा के अनुसार तैयार किया गया है। गंगाजल में सुधार होने से कैथी के निकट ढाका गांव में डॉल्फिन प्वाइंट पर डॉल्फिन की संख्या में बढ़ोतरी होने की संभावनाएं तेज हो गई हैं। नदी विज्ञानियों का कहना है कि जनवरी में गंगाजल में बढ़ी हुई आक्सीजन की मात्रा डॉल्फिन के प्रवास के लिए बेहद फायदेमंद है।
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गंगा से लुप्त हो चुके इस जीव के संरक्षण के लिए सरकार की तरफ से अभियान भी चलाया जा रहा है। नाविक प्रमोद मांझी ने बताया कि राजघाट से लेकर मणिकर्णिका तक पानी की गहराई अधिक है और डॉल्फिन हमेशा गहराई में रहती हैं। इन दिनों गंगाजल भी काफी साफ नजर आ रहा है। इसलिए इस ओर लगभग 60 से 70 डॉल्फिन सैर करती नजर आ ही जाती हैं।

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फिर से होगा गंगा में डॉल्फिन का सर्वे
डीएफओ महावीर कौजालगी का कहना है कि ढाका से लेकर गंगा और गोमती के संगम तक डॉल्फिन की सक्रियता सबसे ज्यादा देखी जाती है, क्योंकि जहां पर जलधाराएं आपस में टकराती हैं, वहां पर इनके पाए जाने की संभावना अधिक रहती है। कैथी क्षेत्र में पिछले दो सालों में 22 डॉल्फिन की गिनती की गई थी। जल्द ही काशी में डॉल्फिन की गणना के लिए सर्वे शुरू कराया जाएगा। प्रदूषण में कमी आने के साथ ही घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ने से राष्ट्रीय जलीय जानवर डॉल्फिन का कुनबा भी तेजी से बढ़ेगा। 

ईको टूरिज्म को मिलेगा बढ़ावा
नदी विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी ने बताया कि गंगाजल की गुणवत्ता में सुधार जलीय जीवों के साथ ही स्थानीय लोगों के लिए भी लाभदायक है। डॉल्फिन की संख्या बढ़ने से जहां ईको टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा, वहीं रोजगार के नए रास्ते भी विकसित होंगे। गंगेटिक डॉल्फिन की संख्या भी तेजी से बढ़ेगी।

राष्ट्रीय जलीय जीव है डॉल्फिन
पांच अक्तूबर को गंगा नदी डॉल्फिन दिवस मनाया जाता है। 2010 में गंगेटिक डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया था। भारत में डॉल्फिन असम, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में देखी जा सकती है। एनएमसीजी की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 4000 से अधिक डॉल्फिन हैं। 

साफ पानी का संकेत भी है सूंस
सूंस दरअसल, स्वच्छ जल का भी संकेत होती हैं। गंगेज डॉल्फिन यानी सूंस जिन जगहों पर पाई जाती हैं माना जाता है कि वहां का जल काफी स्वच्छ होता है। पर्यावरण विद मानते हैं कि गंगा से जुड़ी नहरों में भी पूर्व में सूंस पाई गई हैं। जहां पर नदी का पानी अधिक साफ होता है वहां सूंस की मौजूदगी भी अधिक है। 

बढ़ी है गंगाजल की गुणवत्ता
क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी कालिका सिंह ने बताया कि शहर में गिरने वाले दो दर्जन से अधिक नालों को बंद कर दिया गया है। वहीं वरुणा के 11 नाले भी पूरी तरह से बंद हैं। इससे डाउनस्ट्रीम में भी गंगाजल की गुणवत्ता सुधरी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार रामनगर से राजघाट तक गंगा जल की गुणवत्ता में लगातार सुधार हो रहा है। वर्तमान समय में गंगा जल का बीओडी अप स्ट्रीम पर 1.8 है, जबकि डाउन स्ट्रीम पर यह 3.2 है। अप स्ट्रीम पर घुलनशील आक्सीजन की मात्रा 9.2 है और डाउन स्ट्रीम में 8.2 है। घुलनशील आक्सीजन छह से ऊपर होने का मतलब है पानी की गुणवत्ता अच्छी है। गंगा में घुलनशील आक्सीजन, बीओडी, फीकल कॉलीफार्म और पीएच की मात्रा मानकों के हिसाब से जनवरी के पहले सप्ताह से ही लगातार सुधर रही है।

एसटीपी कर रहे बेहतर काम, परिणाम उत्साहजनक
बीएचयू के प्रख्यात नदी विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी का कहना है कि गंगाजल की गुणवत्ता में सुधार होने का मतलब है कि गंगाबेसिन में बने सभी एसटीपी बेहतर काम कर रहे हैं। गंगाजल को प्रदूषित करने वाले कारकों में सीवेज प्रमुख है।

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