अतीत का खुलेगा राज: काशी स्टेशन के पास 68 साल पहले मिले कंकाल का होगा डीएनए टेस्ट, वैज्ञानिक जांच शुरू
Varanasi News: 68 साल पहले काशी स्टेशन के पास राजघाट में खोदाई के दौरान मिले कंकाल का डीएनए टेस्ट होगा। इसके लिए बीएचयू के प्राचीन इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व विभाग में वर्ष 1957 से रखे लकड़ी का ताबूत खोला गया।
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आज से 68 साल पहले काशी स्टेशन के पास राजघाट में खोदाई के दौरान मिले 5.3 फीट लंबे प्राचीन पुरुष नर कंकाल का बीएचयू में डीएनए टेस्ट होगा। रेडियोकार्बन डेटिंग के माध्यम से उसकी उम्र का पता लगाया जाएगा। वैज्ञानिकों का दावा है इससे सिंधु घाटी और राखीगढ़ी जैसी गंगा घाटी की सभ्यता का पता चल सकता है और काशी की प्राचीनता का रहस्य भी सामने आ सकता है।
मंगलवार को बीएचयू के प्राचीन इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व विभाग में वर्ष 1957 से रखे लकड़ी का ताबूत खोला गया। इसमें रखे कंकाल के टुकड़ों को निकाला गया। इसे किसी भी लेप से संरक्षित नहीं किया गया था। विभागाध्यक्ष प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार को एक सप्ताह पहले ही इस कंकाल की जानकारी मिली तो उन्होंने जंतु विज्ञान विभाग के ज्ञान लैब से संपर्क कर डीएनए जांच का प्रस्ताव दिया।
मंगलवार को सुबह 11 बजे ज्ञान लैब से आए प्राचीन डीएनए के विशेषज्ञ डॉ. प्रज्ज्वल प्रताप सिंह ने कंकाल से सावधानीपूर्वक नमूनों को इकट्ठा किया। प्राचीन डीएनए विश्लेषण की मदद से व्यक्ति की आनुवंशिक वंशावली, जनसंख्या संबंध और राखीगढ़ी सहित कई प्राचीन दक्षिण एशियाई नमूनों से तुलना की जाएगी। वैज्ञानिकों को खोदाई के दौरान साइट पर ली गई इस कंकाल की तस्वीर भी मिली है।
गंगा घाटी में रहने वाले प्राचीन लोग कौन थे
प्रो. अहिरवारः इस अध्ययन की शुरुआत करने वाले प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार ने कहा कि इस कंकाल को सुरक्षित रखना हमारे विभाग की जिम्मेदारी थी। अब आधुनिक वैज्ञानिक विधियों के माध्यम से हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि गंगा घाटी में रहने वाले प्राचीन लोग कौन थे, उनकी जीवनशैली कैसी थी और उनकी आनुवंशिक पहचान क्या थी। विभाग के शताब्दी वर्ष में ज्ञान लैब के साथ यह सहयोग पुरातत्व और विज्ञान के बीच की दूरी को कम किया जा रहा है।
काशी और गंगा घाटी में रहने वाले प्राचीन लोगों की आनुवंशिक पहचान, उनकी जीवनशैली और सिंधु घाटी सभ्यता (राखीगढ़ी) के लोगों से उनकी कितनी समानता या भिन्नता थी, इन प्रश्नों का जवाब खोजा जाएगा। जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि यह अध्ययन गंगा घाटी की प्राचीन आबादी की आनुवंशिक विविधता को समझने का दुर्लभ अवसर देता है। प्राचीन डीएनए से वंशावली का पता लगाएंगे।
1940 में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार में पता चला
राजघाट उत्खनन स्थल की खोज 1940 में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार के दौरान हुई थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और बीएचयू की ओर से 1957 से 1969 के बीच बड़े स्तर पर उत्खनन कराए गए। प्रो. अवध किशोर नारायण और टीएन रॉय के नेतृत्व में ये काम किया गया, जिसमें 17 हड्डियां यहां से मिलीं। इनमें आवासीय संरचनाएं, टेराकोटा कलाकृतियां, मुहरें और कई अहम पुरावशेष भी मिले।
अधिकारी बोले
राजघाट के कंकाल पर यह अध्ययन पुरातत्व, इतिहास और आनुवंशिकी के बीच एक सेतु का निर्माण करेगा। ऐसे अंतर-विषयक शोध अकादमिक गरिमा के साथ भारत की प्राचीन विरासत को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने में भी बड़ा योगदान देंगे। -प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी, कुलपति, बीएचयू