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डिनो की कंपनी से विश्वनाथ मंदिर का करार रद्द

Thu, 10 Sep 2015 02:23 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Thu, 10 Sep 2015 02:23 AM IST
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Dino maria vishwanath temple of contract with the company canceled

फिल्म अभिनेता डिनो मॉरियो की कंपनी आईभक्ति से ऑनलाइन प्रसाद वितरण और पूजा-आरती कराने का करार बुधवार को विश्वनाथ मंदिर प्रशासन ने रद्द कर दिया।

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अनुबंध की शर्तों के अनुसार कंपनी के काम न कर पाने की वजह से यह फैसला लिया गया। न्यास परिषद की मंजूरी के बिना ही अफसरों ने लखनऊ में सीएम अखिलेश यादव के हाथों इस बेबसाइट की लांचिंग करा दी थी।  
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अमेरिकी कंपनी क्लाउड डॉटा लैब्स की तकनीकी मदद से संचालित डिनो की वेबसाइट आई भक्ति से नियमों को ताक पर रखकर किए गए करार का अमर उजाला ने खुलासा किया तो हड़कंप मच गया लेकिन ऑनलाइन प्रसाद की बुकिंग होती रही। उसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
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 हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने शासन से डिनो की कंपनी से हुए अनुबंध की प्रक्रिया के बारे में प्रमुख सचिव (धर्मार्थ कार्य) नवनीत सहगल से जवाब-तलब किया। उन्होंने मुख्य कार्यपालक अधिकारी अजय कुमार अवस्थी को पत्र भेजकर इस वस्तुस्थिति की जानकारी ली और रिपोर्ट कोर्ट को दे दी।
इस बीच तकनीकी खराबी से आईभक्ति का काम ठप हो गया लेकिन बुकिंग जारी रही। महीने भर पहले इस मामले में आईभक्ति प्रबंधन को नोटिस जारी कर काम न कर पाने की वजहों पर जवाब मांगा गया था। संतोषजनक जवाब न मिलने पर बुधवार को सीईओ ने डिनो मॉरियो की कंपनी से हुए अनुबंध को निरस्त कर दिया। इस अनुबंध के तहत प्रसाद की बिक्री और पूजा, आरती की बुकिंग से होने वाली आय का 18 प्रतिशत विश्वनाथ मंदिर प्रशासन को देने की शर्त तय हुई थी।

इससे पहले खीरा इंडस्ट्रियल इस्टेट, एसटी रोड सांताक्रूज मुंबई के पते से संचालित ‘आई भक्ति’ वेबसाइट के संचालन के लिए प्रमुख सचिव के निर्देश पर मंदिर प्रशासन ने विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह और परिसर में हाई डेफिनेशन मॉड के कैमरे भी लगवा दिए थे।
इन कैमरों का मॉनीटर कंट्रोल मंदिर के बाहर एक किराए के भवन में संचालित आईभक्ति के दफ्तर को दे दिया गया था। इन कैमरों को फिलहाल अभी तक हटाया नहीं गया है। बाबा के भक्तों को ऑन लाइन प्रसाद बेचने के अनुबंध को लेकर विश्वनाथ मंदिर प्रशासन विवादों में घिरा रहा है। इस अनुबंध में नियमों का पालन न करने की आवाज उठाने पर न्यास के अध्यक्ष आचार्य पं. अशोक द्विवेदी भी अफसरों के कोपभाजन का शिकार होना पड़ा था।

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