Dev Diwali 2020: देव दीपावली पर काशी में गंगा घाटों पर होगा अद्भुत नजारा, पहली बार होने जा रहा कुछ खास
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न भूतो, न भविष्यति की तर्ज पर काशी की देव दीपावली का नजारा अद्भुत होगा। पहली बार गंगा के तट पर 22 जगहों पर एक साथ गंगा आरती की जाएगी। दशाश्वमेध घाट पर महाआरती का आयोजन किया गया है। यहां 21 अर्चक मां गंगा की आरती करेंगे तो 42 ऋद्धि-सिद्धि चंवर डुलाएंगी। पर्यटन विभाग का अनुमान है कि इस बार 15 से 20 लाख दीप जलाए जाएंगे। दशाश्वमेध घाट पर 11 हजार दीप जलाने की योजना है।
काशी की गंगा आरती तो देश भर में प्रसिद्ध है, लेकिन देव दीपावली पर आरती का नजारा अलग होगा। अस्सी से राजघाट तक 84 घाटों के बीच 22 जगहों पर गंगा आरती का आयोजन किया जाएगा। इसमें अस्सी, भदैनी, तुलसीघाट, शिवाला, हरिश्चंद्र, शंकराचार्य घाट, दशाश्वमेध, अहिल्याबाई, ललिताघाट, पंचगंगा, सिंधिया, मणिकर्णिका प्रमुख हैं।
गंगोत्री सेवा समिति के संस्थापक अध्यक्ष पं. किशोरी रमन दुबे बाबू महाराज ने बताया कि प्राचीन दशाश्वमेध घाट पर महाआरती का आयोजन किया जा रहा है। मां गंगा का 151 लीटर दूध से अभिषेक होगा। घाट पर 11 हजार दीप जलाए जाएंगे और विद्युत झालर व फूलों से भव्य सजावट की जाएगी। कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करते हुए महाआरती होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देव दीपावली पर आगमन ने आयोजन को और भी खास बना दिया है।
समिति के सचिव दिनेश शंकर दुबे ने बताया कि दशाश्वमेध घाट पर रजत सिंहासन पर हर साल की तरह इस बार भी मां गंगा की अष्टधातु की प्रतिमा विराजमान रहेगी। मां गंगा की प्रतिमा साल में दो बार गंगा दशहरा और देव दीपावली पर घाट पर लोगों के दर्शन-पूजन के लिए स्थापित की जाती है। आयोजन के दौरान शासन की ओर से जारी की गई गाइडलाइन का पालन किया जाएगा।
तैयार हो रहा इंडिया गेट
गंगा सेवा निधि के अध्यक्ष सुशांत मिश्र ने बताया कि दशाश्वमेध घाट पर महाआरती का आयोजन किया जा रहा है। वहीं, शहीदों की याद में इंडिया गेट की रेप्लिका का भी निर्माण कराया जा रहा है। महाआरती के साथ ही घाट को फूलों, विद्युत झालरों और दीयों से सजाया जाएगा।
कार्तिक पूर्णिमा की रात गंगा तट पर उतर आता है देवलोक
कार्तिक पूर्णिमा की रात गंगा के अर्द्धचंद्राकार घाटों की रोशनी से जगमग छटा देवलोक का अहसास कराती है। 14 सालों में ही काशी की देव दीपावली देश की सांस्कृतिक राजधानी की एक अलग पहचान बन चुकी है।
गंगा के 84 घाटों पर सात किलोमीटर तक शृंखला में दीप जलते हैं। शाम होते ही सभी घाट दीपों की रोशनी में नहा उठते हैं।
इन अनुपम दृश्यों को यादों में सहेजने के लिए घाटों पर देश-विदेश से अतिथि पहुंचत रहे हैं। हालांकि इस बार कोरोना काल में स्थितियां थोड़ी बदली हुई हैं। ना भूतो ना भविष्यति की तर्ज पर आयोजित देव दीपावली की भव्यता तो अवर्णनीय होगी लेकिन सैलानियों की संख्या कम होगी। शरद पूर्णिमा से पूर्वजों के लोक को रौशन करने के लिए दीपदान की परंपरा कार्तिक पूर्णिमा पर देवाराधना का महापर्व बन जाती है।
केंद्रीय देव दीपावली समिति के अध्यक्ष आचार्य वागीश दत मिश्र ने बताया कि दो दशकों से काशी की देव दीपावली ने महापर्व का स्वरूप ले लिया है। शंकराचार्य की प्रेरणा से प्रारंभ होने वाला यह दीपोत्सव पहले केवल पंचगंगा घाट की शोभा था। आगे चलकर काशी के सभी घाटों पर दीपों की शृंखला बढ़ती चली गई।
अहिल्याबाई होल्कर ने स्थापित किया था हजारा दीप
काशी की देव दीपावली प्राचीनता और परंपरा का अद्भुत संगम है। महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने पंचगंगा घाट पर पत्थरों से बना खूबसूरत हजारा दीपस्तंभ स्थापित किया था। यह हजारा दीप देवदीपावली की परंपरा का साक्षी है। काशी में देवदीपावली की शुरूआत भी यहीं से हुई थी। पंचगंगा घाट का यह हजारा दीपस्तंभ देव दीपावली के दिन 1001 से अधिक दीपों की लौ से जगमगाता है।
लक्खा मेला
काशी में लक्खा मेले की प्राचीन परंपरा है। इसमें लाख से अधिक लोग एकत्र होते हैं। इसमें नाटी इमली भरत मिलाप, तुलसी घाट की नागनथैया, चेतगंज की नक्कटैया और रथयात्रा मेला शामिल हैं। काशी के घाटों पर संपन्न होने वाली देव दीपावली में शामिल होने वाली लाखों की भीड़ ने इसे काशी के पांचवें लक्खा मेले का रूप दे दिया है।