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पंचगंगा घाट से शुरू होकर सात समंदर पार पहुंची देव दीपावली
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उत्तर वाहिनी गंगा के तट पर देव दीपावली के दिन पूरा देवलोक उतर आता है। काशी की देव दीपावली का विहंगम व मनोरम दृश्य आंखों में उतारने के लिए हर मन आतुर रहता है। पंचगंगा घाट सहित छह घाटों से शुरू हुई देव दीपावली आज सात समंदर पार तक लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। काशी की देव दीपावली अब महापर्व का स्वरूप ले चुकी है।
काशी विद्वत परिषद के मंत्री पं. दीपक मालवीय ने बताया कि महारानी अहिल्याबाई ने सबसे पहले 1785 के आसपास के एक हजारा और पांच सौ दीपों का स्तंभ पंचगंगा घाट पर बनवाया था। इसे कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही जलाया जाता है। देव दीपावली और गंगा आरती की शुरुआत भी इसी घाट से हुई थी। हालांकि 14वीं सदी से ही गंगा किनारे दीपोत्सव के प्रमाण मिलते हैं। इसी विरासत को सहेजने का जतन हुआ। 1983 में काशी नरेश विभूति नारायण सिंह, पंडित विजय शंकर उपाध्याय और अवध बिहारी लाल ने भव्यता के साथ इसे शुरू किया। पूरे घाट को लगभग 20 हजार दीपों से पहली बार सजाया गया था। 1986 में पंचगंगा सहित कु ल छह घाटों पर दीप जलाकर देव दीपावली का उत्सव मनाया गया। उत्सवधर्मिता वाले शहर में 1987 में देव दीपावली महोत्सव को श्रीमठ पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य का संवर्धन मिला। जन सहयोग और मठ के संरक्षण से आसपास के कई घाटों पर देवों की दीपावली का विस्तार हुआ। छह की जगह 12 घाट दीया और बाती की रोशनी से नहा उठे। 1988 तक पंचगंगा घाट का यह उत्सव 24 घाटों तक विस्तार ले चुका था। 1989-90 में शांति व्यवस्था प्रभावित होने के कारण उत्सव का स्वरूप फीका रहा, लेकिन 1991 में देव महोत्सव को स्वामी रामनरेशाचार्य ने फिर से भव्यता प्रदान की। 1994 तक पं. किशोरी रमण दूबे बाबू महाराज, पं. सत्येंद्र नाथ मिश्र और उनके सहयोगियों ने उत्सव को देश ही नहीं, सात समंदर पार तक पहुंचा दिया।
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काशी विद्वत परिषद के मंत्री पं. दीपक मालवीय ने बताया कि महारानी अहिल्याबाई ने सबसे पहले 1785 के आसपास के एक हजारा और पांच सौ दीपों का स्तंभ पंचगंगा घाट पर बनवाया था। इसे कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही जलाया जाता है। देव दीपावली और गंगा आरती की शुरुआत भी इसी घाट से हुई थी। हालांकि 14वीं सदी से ही गंगा किनारे दीपोत्सव के प्रमाण मिलते हैं। इसी विरासत को सहेजने का जतन हुआ। 1983 में काशी नरेश विभूति नारायण सिंह, पंडित विजय शंकर उपाध्याय और अवध बिहारी लाल ने भव्यता के साथ इसे शुरू किया। पूरे घाट को लगभग 20 हजार दीपों से पहली बार सजाया गया था। 1986 में पंचगंगा सहित कु ल छह घाटों पर दीप जलाकर देव दीपावली का उत्सव मनाया गया। उत्सवधर्मिता वाले शहर में 1987 में देव दीपावली महोत्सव को श्रीमठ पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य का संवर्धन मिला। जन सहयोग और मठ के संरक्षण से आसपास के कई घाटों पर देवों की दीपावली का विस्तार हुआ। छह की जगह 12 घाट दीया और बाती की रोशनी से नहा उठे। 1988 तक पंचगंगा घाट का यह उत्सव 24 घाटों तक विस्तार ले चुका था। 1989-90 में शांति व्यवस्था प्रभावित होने के कारण उत्सव का स्वरूप फीका रहा, लेकिन 1991 में देव महोत्सव को स्वामी रामनरेशाचार्य ने फिर से भव्यता प्रदान की। 1994 तक पं. किशोरी रमण दूबे बाबू महाराज, पं. सत्येंद्र नाथ मिश्र और उनके सहयोगियों ने उत्सव को देश ही नहीं, सात समंदर पार तक पहुंचा दिया।
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