काशी में मंथन: राजस्थान की विरासत पर जुटे देश-विदेश के विद्वान, पुरातनता और परिवर्तन पर बातचीत; दिए सुझाव
वैदिक विज्ञान केंद्र में राजस्थान की ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक और सांस्कृतिक विरासत पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू हुई। ‘राजस्थान पुरातनता और परिवर्तन’ विषयक आयोजन में देश-विदेश के विद्वानों ने स्थानीय स्रोतों, सांस्कृतिक निरंतरता, विरासत संरक्षण, स्थापत्य और मानव-पर्यावरण संबंधों पर विचार रखे। आयोजन में सैकड़ों विद्वानों, शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं ने प्रतिभाग किया।
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राजस्थान की ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक और सांस्कृतिक विरासत के विविध आयामों तथा उनमें निरंतरता और परिवर्तन की प्रक्रियाओं पर काशी में देश-विदेश के विद्वानों ने मंथन किया। वाराणसी इंस्टीट्यूट ऑफ हिस्ट्री की ओर से वैदिक विज्ञान केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘राजस्थान पुरातनता और परिवर्तन’ का आयोजन किया जा रहा है। उद्घाटन सत्र में राजस्थान के इतिहास, कला-संस्कृति, लोक परंपराओं और विरासत के संरक्षण पर शोधपरक चर्चा हुई।
संगोष्ठी का शुभारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन और वंदे मातरम् के सामूहिक गान के साथ हुआ। वाराणसी इंस्टीट्यूट ऑफ हिस्ट्री की संस्थापक निदेशक एमेरिटस प्रोफेसर अरुणा सिन्हा ने अतिथियों और देश-विदेश से आए विद्वानों एवं शोधार्थियों का स्वागत किया। उन्होंने राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत, पुरातात्त्विक धरोहर, कला-संस्कृति, लोक परंपराओं और सामाजिक बदलावों को रेखांकित किया। कहा कि राजस्थान का अतीत उसकी सांस्कृतिक निरंतरता और वर्तमान परिवर्तनों को समझने का महत्वपूर्ण आधार है।
स्थानीय स्रोतों और परंपराओं के अध्ययन पर जोर
मुख्य वक्ता प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. श्री कृष्ण जुगनू ने राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोतों, साहित्यिक परंपराओं और क्षेत्रीय इतिहास के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राजस्थान की ऐतिहासिक चेतना को समझने के लिए स्थानीय स्रोतों और पारंपरिक ज्ञान-संपदा का गंभीर अध्ययन जरूरी है। उन्होंने पुरातात्त्विक एवं ऐतिहासिक स्रोतों, स्मारकीय विरासत और इतिहास लेखन की विविध परंपराओं पर भी चर्चा की। विरासत के सामाजिक, सांस्कृतिक और समकालीन संदर्भों में पुनर्पाठ की आवश्यकता भी बताई।
हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविंदर गुप्ता ने मुख्य अतिथि के रूप में राजस्थान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, अध्ययन तथा भावी पीढ़ियों तक उसके हस्तांतरण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने भारतीय इतिहास और संस्कृति की विविध परंपराओं को व्यापक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में समझने तथा अकादमिक शोध को समाज से जोड़ने के महत्व को रेखांकित किया।
भारत की सांस्कृतिक निरंतरता पर विद्वानों की चर्चा
बेल्जियम के भारतविद् डॉ. कोएनराड एल्स्ट ने भारतीय सभ्यता और राजस्थान की सांस्कृतिक परंपराओं के संदर्भ में भारतीय इतिहास, परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता से जुड़े विषयों पर विचार रखे। प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता प्रो. राणा पीबी सिंह ने राजस्थान के सांस्कृतिक भू-दृश्य, विरासत और मानव-पर्यावरण संबंधों के अंतर्संबंधों पर चर्चा की। उन्होंने धरोहर अध्ययन में अंतर्विषयी दृष्टिकोण अपनाने और स्थापत्य कला के विकास तथा उसके निर्माण की वैज्ञानिक तकनीकों के अध्ययन की जरूरत बताई।
समारोह की अध्यक्षता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी के निदेशक डॉ. अभिजीत दीक्षित ने की। उन्होंने भारतीय कला, संस्कृति और विरासत के संरक्षण तथा उनके अकादमिक दस्तावेजीकरण के महत्व को रेखांकित किया।
सैकड़ों विद्वानों और शोधार्थियों ने लिया हिस्सा
संगोष्ठी में राजस्थान की पुरातात्त्विक, ऐतिहासिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक विरासत के विभिन्न पक्षों पर शोधपरक विमर्श हुआ। आयोजन का उद्देश्य अतीत और वर्तमान के बीच अंतर्संबंधों को समझना तथा राजस्थान के इतिहास और विरासत पर नए अकादमिक दृष्टिकोणों को प्रोत्साहित करना है।
अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में देश-विदेश से आए विद्वानों, शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं ने प्रतिभाग किया। उद्घाटन सत्र का संचालन बीएचयू के इतिहास विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. जयलक्ष्मी कौल ने किया। डॉ. श्रेया पाठक ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर प्रो. अरुणा सिन्हा, प्रो. राणा पीबी सिंह, डॉ. अभिजीत दीक्षित समेत अन्य विद्वान मौजूद रहे।