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दयाचंद जैन को जीवित ही अमर शहीद का सौभाग्य मिला
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जीवित अवस्था में ही अमर शहीद होने का सौभाग्य स्याद्वाद महाविद्यालय के छात्र दयाचंद जैन को मिला था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जैन विद्यार्थियों ने पूरे बनारस की पाठशालाओं, विद्यालय और महाविद्यालयों में जाकर छात्रों को जगाने का काम किया। हड़ताल के लिए उकसाया, पर्चे बांटे और जुलूस निकाले। जैन छात्रावास के विद्यार्थी दयाचंद जैन वापस नहीं लौटे, पुलिस उनको खोज रही थी। इसलिए खबर उड़ा दी गई कि उनको गोली मारी गई है। बीएचयू में उनके लिए शोक प्रस्ताव भी पास हो गया। वह भूमिगत होकर जीवित थे और जीवित अवस्था में ही अमर शहीद होने का सौभाग्य मिल गया।
जैन दर्शन के आचार्य प्रो. अनेकांत कुमार जैन के अनुसार 1942 में भदैनी क्षेत्र में गंगा के मनमोहक तट जैन घाट पर स्थित स्याद्वाद महाविद्यालय और उसका छात्रावास आजादी की लड़ाई में अगस्त क्रांति का गढ़ बन चुका था। जब काशी विद्यापीठ पूर्ण रूप से बंद कर दिया गया, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रावास जबरन खाली करवा दिया गया और आंदोलन नेतृत्व विहीन हो गया। तब आंदोलन की बुझती हुई लौ को जलाने का काम इसी स्याद्वाद महाविद्यालय के जैन छात्रावास ने किया था। स्याद्वाद महाविद्यालय और शिवपुर में रणभेरी क्रांतिकारी नामक बुलेटिन की प्रतियां छपती थीं। जब प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो मुल्तानी मिट्टी को गला कर उस पर बैगनी स्याही से मैटर का अक्श निकाल कर रोज 250 प्रतियां निकाली जाती थीं। क्रांतिकारी दल रात 10 बजे के बाद इसकी प्रतियां बांटता था जिसमें क्रांति की समूची योजना और क्रांतिकारी भाषण और कविताएं छपी होती थीं।
मिली हथियार छुपाने की सूचना
स्याद्वाद महाविद्यालय की स्मारिका में उल्लेख है कि अंग्रेजों के खुफिया विभाग को सूचना मिली कि महाविद्यालय में खतरनाक हथियार छिपाए गए हैं तथा कई क्रांतिकारी छुपे हुए हैं। तब यहां की तलाशी ली गई, किंतु कुछ नहीं मिला। उन्हें खबर हुई कि हथियार गंगा में फेंक दिए गए हैं, गंगा में हथियार खोजे गए, किंतु वहां भी कुछ नहीं मिला। बगल में छेदी लाल मंदिर के एक कमरे से एक भरी हुई पिस्तौल और तोड़फोड़ का सामान मिला। छात्र क्रांतिकारी गुलाबचंद जैन, अमृतलाल जैन और घनश्याम दास जैन गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें 18 दिन जेल में रखा गया फिर जमानत हुई। महाविद्यालय के अधिष्ठाता बाबू हरिश्चंद्र जैन के ऊपर उन छात्रों को निकालने और महाविद्यालय को बंद करने का दबाव बढ़ गया।
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अंग्रेजों की यातनाएं सहीं, जेल गए
महाविद्यालय के अनेक छात्र जिन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी, अंग्रेजों की यातनाएं सहीं, जेल गए और बाद में जैन धर्म दर्शन के प्रख्यात विद्वान बने। अनेक शास्त्र लिखे, अनुवाद और शोधकार्य किए। धर्म की रक्षा के लिए एक हाथ में शास्त्र और राष्ट्र की रक्षा के लिए दूसरे हाथ में शस्त्र उठाने वाले क्रांतिकारी, जेल यात्रा करने वाले स्वतंत्रता संग्रामी जिन जैन विद्यार्थी विद्वानों के नाम मिल सके हैं उनमें 21 नाम प्रमुख हैं। इसमें पंडित अमृतलाल शास्त्री, डॉ. हरींद्रभूषण जैन, डॉ. बालचंद जैन, चौधरी सगुनचंद जैन, धन्यकुमार जैन, पं. खुशालचंद जी गोरावाला, पंडित राजकुमार शास्त्री, पंडित लोकमणि जैन, शीतलप्रसाद जैन, गुलाबचंद जैन, घनश्याम दास जैन, पंडित कैलाश चंद शास्त्री, पंडित फूलचंद सिद्धांतशास्त्री, डॉ. गुलाब चंद चौधरी, डॉ. राजाराम जैन, दयाचंद जैन, नाभिनंदन जैन, भागचंद जैन, डॉ. पूरनचंद जैन, बाबूलाल फागुल्ल, रतन पहाड़ी प्रमुख हैं।
आए थे बापू
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी स्याद्वाद महाविद्यालय में पधारे थे। तब उन्होंने यहां अपने कर कमलों से लिखा था कि इस संस्था में आकर मैं बहुत खुश हुआ हूं ,मेरी उम्मीद है कि इस संस्था के विद्यार्थी ऐसे कर्म निष्ठ होंगे कि जिससे समस्त हिंद को फायदा हो।
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जैन दर्शन के आचार्य प्रो. अनेकांत कुमार जैन के अनुसार 1942 में भदैनी क्षेत्र में गंगा के मनमोहक तट जैन घाट पर स्थित स्याद्वाद महाविद्यालय और उसका छात्रावास आजादी की लड़ाई में अगस्त क्रांति का गढ़ बन चुका था। जब काशी विद्यापीठ पूर्ण रूप से बंद कर दिया गया, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रावास जबरन खाली करवा दिया गया और आंदोलन नेतृत्व विहीन हो गया। तब आंदोलन की बुझती हुई लौ को जलाने का काम इसी स्याद्वाद महाविद्यालय के जैन छात्रावास ने किया था। स्याद्वाद महाविद्यालय और शिवपुर में रणभेरी क्रांतिकारी नामक बुलेटिन की प्रतियां छपती थीं। जब प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो मुल्तानी मिट्टी को गला कर उस पर बैगनी स्याही से मैटर का अक्श निकाल कर रोज 250 प्रतियां निकाली जाती थीं। क्रांतिकारी दल रात 10 बजे के बाद इसकी प्रतियां बांटता था जिसमें क्रांति की समूची योजना और क्रांतिकारी भाषण और कविताएं छपी होती थीं।
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मिली हथियार छुपाने की सूचना
स्याद्वाद महाविद्यालय की स्मारिका में उल्लेख है कि अंग्रेजों के खुफिया विभाग को सूचना मिली कि महाविद्यालय में खतरनाक हथियार छिपाए गए हैं तथा कई क्रांतिकारी छुपे हुए हैं। तब यहां की तलाशी ली गई, किंतु कुछ नहीं मिला। उन्हें खबर हुई कि हथियार गंगा में फेंक दिए गए हैं, गंगा में हथियार खोजे गए, किंतु वहां भी कुछ नहीं मिला। बगल में छेदी लाल मंदिर के एक कमरे से एक भरी हुई पिस्तौल और तोड़फोड़ का सामान मिला। छात्र क्रांतिकारी गुलाबचंद जैन, अमृतलाल जैन और घनश्याम दास जैन गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें 18 दिन जेल में रखा गया फिर जमानत हुई। महाविद्यालय के अधिष्ठाता बाबू हरिश्चंद्र जैन के ऊपर उन छात्रों को निकालने और महाविद्यालय को बंद करने का दबाव बढ़ गया।
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अंग्रेजों की यातनाएं सहीं, जेल गए
महाविद्यालय के अनेक छात्र जिन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी, अंग्रेजों की यातनाएं सहीं, जेल गए और बाद में जैन धर्म दर्शन के प्रख्यात विद्वान बने। अनेक शास्त्र लिखे, अनुवाद और शोधकार्य किए। धर्म की रक्षा के लिए एक हाथ में शास्त्र और राष्ट्र की रक्षा के लिए दूसरे हाथ में शस्त्र उठाने वाले क्रांतिकारी, जेल यात्रा करने वाले स्वतंत्रता संग्रामी जिन जैन विद्यार्थी विद्वानों के नाम मिल सके हैं उनमें 21 नाम प्रमुख हैं। इसमें पंडित अमृतलाल शास्त्री, डॉ. हरींद्रभूषण जैन, डॉ. बालचंद जैन, चौधरी सगुनचंद जैन, धन्यकुमार जैन, पं. खुशालचंद जी गोरावाला, पंडित राजकुमार शास्त्री, पंडित लोकमणि जैन, शीतलप्रसाद जैन, गुलाबचंद जैन, घनश्याम दास जैन, पंडित कैलाश चंद शास्त्री, पंडित फूलचंद सिद्धांतशास्त्री, डॉ. गुलाब चंद चौधरी, डॉ. राजाराम जैन, दयाचंद जैन, नाभिनंदन जैन, भागचंद जैन, डॉ. पूरनचंद जैन, बाबूलाल फागुल्ल, रतन पहाड़ी प्रमुख हैं।
आए थे बापू
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी स्याद्वाद महाविद्यालय में पधारे थे। तब उन्होंने यहां अपने कर कमलों से लिखा था कि इस संस्था में आकर मैं बहुत खुश हुआ हूं ,मेरी उम्मीद है कि इस संस्था के विद्यार्थी ऐसे कर्म निष्ठ होंगे कि जिससे समस्त हिंद को फायदा हो।