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महाश्मशान पर रात भर गूंजती रही घुंघरू की झनकार, नगर वधुओं ने प्रस्तुत की नृत्य की भावांजलि
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Sun, 25 Mar 2018 10:41 AM IST
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नृत्य करती नगर वधुएं
- फोटो : अमर उजाला
शिव की नगरी काशी में शिव रिझाने शक्ति आईं मशाने... की धुन पर काशी के महाश्मशान पर घुंघरूओं की झनकार गूंज उठी। मणिकर्णिका घाट पर पूरी रात सजने वाली इस महफिल ने बरबस ही हर किसी का ध्यान खींचा।
साढ़े तीन सौ साल की परंपरा के तहत नगर वधुओं ने बाबा मशाननाथ के दरबार में नृत्य की भावांजलि प्रस्तुत की और पूरी रात महाश्मसान घुंघरूओं की झनकार से गूंजता रहा।
नृत्य के भावों ने उन्होंने बाबा से प्रार्थना की वर्तमान जीवन की बुराईयां अगले जन्म में हमारे साथ लौटकर न आएं, इसके लिए हम अपनी नृत्य की साधना आपको अर्पित करते हैं। देर रात से शुरू हुआ यह आयोजन मंगला आरती तक चला।
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शनिवार को महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर नवरात्रि की सप्तमी तिथि पर नगर वधुओं ने बाबा मशाननाथ के दरबार में नृत्य की महफिल सजाई। सैकड़ों साल की पुरानी परंपरा को नगरवधुओं ने जीवंत करते हुए भोर तक गीतों की धुन पर अपने नृत्य के जलवे दिखाए।
इस दौरान उन्होंने कार्यक्रम का आरंभ ऊं नम: शिवाय की धुन से किया। इसके बाद उन्होंने आंखों का ये काजल..., पियवा से पहिले हमार रहलू...समेत कई फिल्मी और भक्ति गीतों पर नृत्य पेश किए।
नवरात्रि की सप्तमी को नगर वधुओं ने बाबा मशाननाथ को इसी कामना के साथ खुश करने की कोशिश की कि उनका भी आने वाला कल और अगला जन्म बेहतर हो और उन्हें भी परिवार का प्यार मिले। दर्शक भी मंगला आरती तक नृत्य देखने के लिए महाश्मशान में डटे रहे।
शनिवार की शाम 5 बजे मंदिर में शृंगार के पश्चात रात्रि साढे़ आठ बजे से नगर वधुओं ने नृत्यांजलि पेश की। तीन दिवसीय महोत्सव के अंतिम दिन बाबा महाश्मशान नाथ का विधि विधान से पूजन किया और महाआरती बाद नगर वधुओं का नृत्य शुरू हुआ जो मंगला आरती तक जारी रहा।
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साढ़े तीन सौ साल की परंपरा के तहत नगर वधुओं ने बाबा मशाननाथ के दरबार में नृत्य की भावांजलि प्रस्तुत की और पूरी रात महाश्मसान घुंघरूओं की झनकार से गूंजता रहा।
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नृत्य के भावों ने उन्होंने बाबा से प्रार्थना की वर्तमान जीवन की बुराईयां अगले जन्म में हमारे साथ लौटकर न आएं, इसके लिए हम अपनी नृत्य की साधना आपको अर्पित करते हैं। देर रात से शुरू हुआ यह आयोजन मंगला आरती तक चला।
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शनिवार को महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर नवरात्रि की सप्तमी तिथि पर नगर वधुओं ने बाबा मशाननाथ के दरबार में नृत्य की महफिल सजाई। सैकड़ों साल की पुरानी परंपरा को नगरवधुओं ने जीवंत करते हुए भोर तक गीतों की धुन पर अपने नृत्य के जलवे दिखाए।
इस दौरान उन्होंने कार्यक्रम का आरंभ ऊं नम: शिवाय की धुन से किया। इसके बाद उन्होंने आंखों का ये काजल..., पियवा से पहिले हमार रहलू...समेत कई फिल्मी और भक्ति गीतों पर नृत्य पेश किए।
नवरात्रि की सप्तमी को नगर वधुओं ने बाबा मशाननाथ को इसी कामना के साथ खुश करने की कोशिश की कि उनका भी आने वाला कल और अगला जन्म बेहतर हो और उन्हें भी परिवार का प्यार मिले। दर्शक भी मंगला आरती तक नृत्य देखने के लिए महाश्मशान में डटे रहे।
शनिवार की शाम 5 बजे मंदिर में शृंगार के पश्चात रात्रि साढे़ आठ बजे से नगर वधुओं ने नृत्यांजलि पेश की। तीन दिवसीय महोत्सव के अंतिम दिन बाबा महाश्मशान नाथ का विधि विधान से पूजन किया और महाआरती बाद नगर वधुओं का नृत्य शुरू हुआ जो मंगला आरती तक जारी रहा।
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350 साल पुरानी है परंपरा
मणिकर्णिका घाट पर नगर वधुएं
- फोटो : अमर उजाला
मन्दिर व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने बताया कि शहंशाह अकबर के समय में राजा मान सिंह ने 16वीं शताब्दी में इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। निर्माण के बाद वहां भजन-कीर्तन होना था पर श्मशान होने की वजह से यहां कोई भी ख्यातिबद्ध कलाकर आने को राजी नहीं हुआ।
सभी ने आने से इनकार कर दिया। बाद में नगर वधुओं ने यहां अपनी कार्यक्रम करने की इच्छा जाहिर की और राजा ने उनके इस आमंत्रण को स्वीकार कर लिया। तब से नगर वधुओं के नृत्य की परम्परा शुरू हुई। शिव को समर्पित गणिकाओं की यह भाव पूर्ण नृत्यांजली मोक्ष की कामना से युक्त होती है।
कहते हैं कि इस महाश्मशान पर चिता की आग कभी ठंडी नहीं होती। दूर-दूर से लोग यहां अपनों के अंतिम संस्कार के लिए आते हैं। मान्यता है कि काशी के इस महाश्मशान पर खुद बाबा विश्वनाथ मृतक के कानों में तारक मन्त्र बोलकर उसे मुक्ति प्रदान करते हैं।
इस महाश्मशान के अधिष्ठाता देव बाबा मशाननाथ के दरबार में नाच रही नगर वधुएं भी मुक्ति की ऐसी ही कामना के साथ यहां हर वर्ष आती हैं और मुक्ति अपने जीवन के इस कलंक से हैं।
सभी ने आने से इनकार कर दिया। बाद में नगर वधुओं ने यहां अपनी कार्यक्रम करने की इच्छा जाहिर की और राजा ने उनके इस आमंत्रण को स्वीकार कर लिया। तब से नगर वधुओं के नृत्य की परम्परा शुरू हुई। शिव को समर्पित गणिकाओं की यह भाव पूर्ण नृत्यांजली मोक्ष की कामना से युक्त होती है।
कहते हैं कि इस महाश्मशान पर चिता की आग कभी ठंडी नहीं होती। दूर-दूर से लोग यहां अपनों के अंतिम संस्कार के लिए आते हैं। मान्यता है कि काशी के इस महाश्मशान पर खुद बाबा विश्वनाथ मृतक के कानों में तारक मन्त्र बोलकर उसे मुक्ति प्रदान करते हैं।
इस महाश्मशान के अधिष्ठाता देव बाबा मशाननाथ के दरबार में नाच रही नगर वधुएं भी मुक्ति की ऐसी ही कामना के साथ यहां हर वर्ष आती हैं और मुक्ति अपने जीवन के इस कलंक से हैं।