कोरोना ने छीना सब कुछ: 'पंचायत चुनाव न होते तो पिता जिंदा होते'
काशी विद्यापीठ ब्लॉक के कंपोजिट विद्यालय अलाउद्दीनपुर में कार्यरत रहे सहायक अध्यापक सुरेश चंद्र पांडे निधन हो गया। बड़े बेटे कहा कि कोरोना काल में पंचायत चुनाव न होते तो आज मेरे पिता जिंदा होते।
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प्रदेश में पंचायत चुनाव की अधिसूचना सैकड़ों शिक्षकों के लिए मौत की मुनादी साबित हुई। यह वह शिक्षक थे, जिनके कंधों पर इन चुनावों को पूरा कराने की जिम्मेदारी थी, लेकिन कर्तव्य के निर्वहन के दौरान इन्हें कोरोना वायरस ने अपनी चपेट में ले लिया। अब ये इस दुनिया में नहीं रहे। इनके पत्नी और बच्चे इस कड़वे सच के साथ जीवन गुजार रहे हैं। काशी विद्यापीठ ब्लॉक के कंपोजिट विद्यालय अलाउद्दीनपुर में कार्यरत रहे सहायक अध्यापक सुरेश चंद्र पांडेय का बड़ा बेटा अंबुज कहता है पिता की मौत का गम ता-उम्र रहेगा। कोरोना काल में पंचायत चुनाव ने हंसते खेलते परिवार को तहस-नहस कर दिया। चुनाव न होते तो आज मेरे पिता जिंदा होते।
टेस्ट के नाम पर 10 हजार, भर्ती करने के एक लाख
अंबुज ने बताया कि 12 अप्रैल को उदय प्रताप कॉलेज में चुनाव ड्यूटी के लिए प्रशिक्षण में पिता शामिल हुए थे। 13 को घर लौटे तो सर्दी, जुकाम और गले में खराश की समस्या हो गई। ओपीडी में डॉक्टर को दिखाया तो आरटीपीसीआर कराने की सलाह दी गई। 14 अप्रैल को कोरोना जांच टीम को घर आकर सैंपल लेने के लिए संपर्क किया, लेकिन कोई नहीं आया। धीरे-धीरे पिता को कमजोरी महसूस होने लगी तो उन्होंने खाना पीना छोड़ दिया। 18 अप्रैल को ऑक्सीमीटर पर ऑक्सीजन लेवल जांचा तो लगातार गिरावट दर्ज होने लगा। तबीयत बिगड़ने पर ऑटो में लेकर उन्हें बनारस के सभी अस्पतालों के चक्कर लगाए।
बेड और ऑक्सीजन नहीं होने की वजह से किसी अस्पताल ने उन्हें भर्ती नहीं किया। बाद में रोहनिया स्थित एक निजी अस्पताल ले गए। चिकित्सक ने कोई खास उपचार तो नहीं दिया, उल्टा टेस्टिंग के नाम पर 10 हजार ले लिया। ऑक्सीजन बेड मिला तो उन्हें वहीं दाखिल करा दिया। जिसके बाद अस्पताल ने दवाइयों व अन्य खर्चों के लिए अलग से 40 हजार जमा करा लिए। तबीयत में सुधार नहीं हुआ तो पिता को लेकर दूसरे अस्पताल पहुंचे। वहां एडमिट करने से पहले एक लाख जमा करने की बात कही। काफी मिन्नत करने के बाद उपचार शुरू किया गया। कैसे कैसे 50 हजार जमा कराए, लेकिन बिल मांगा तो अस्पताल ने कहा कि बिल चाहिए तो दूसरी जगह चले जाइये। अभी उन्हें भर्ती किए पांच ही घंटे हुए थे।
अस्पताल से फोन आया कि उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है, लेकिन जवाब नहीं मिल रहा। थोड़ी देर बाद अस्पताल पहुंचे तो देखा कि डॉक्टर उन्हें चेक कर रहे। फिर दस मिनट बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। दोनों भाइयों के नीचे से जमीन खिसक गई। लगा अब मां को क्या जवाब देंगे, उन्हें कैसे संभालेंगे। अंबुज ने बताया कि वह दिल्ली में आईटी कंपनी में जॉब करते हैं। पिछले डेढ़ साल से घर पर हूं और कोविड की वजह से आधी सैलरी मिल रही है। घर की सारी जिम्मेदारियां आ गई हैं। सबसे बड़ी चिंता घर के लोन की सता रही है।
सुरेश चंद्र पांडेय के बेटे अंबुज पांडेय ने बताया कि मृतक आश्रित के तहत मेरे छोटे भाई पंकज ने आवेदन किया है। उसने इसी साल बीएड की पढ़ाई पूरी की है और टीईटी की तैयारी कर रहा है। हमने टीईटी के लिए समय मांगा है जिसे विभाग ने स्वीकार कर लिया है।