काशी के लक्खा मेलों पर कोरोना संकटः लक्ष्मीकुंड का सोरहिया मेला इस वर्ष भी स्थगित, लोलार्क षष्ठी के स्नान पर भी रोक!
आषाढ़ से कार्तिक महीने के बीच काशी में पारंपरिक लक्खा मेलों का आयोजन होता है।लक्खा मेलों पर लगातार दूसरे साल भी कोरोना का साया है।
विस्तार
कोरोना संक्रमण के कारण काशी में एक-एक करके कई परंपराओं पर काली छाया पड़ रही है। प्रसिद्ध लक्खा मेलों पर लगातार दूसरे साल भी कोरोना का साया है। पहले रथयात्रा मेले का आयोजन नहीं हुआ। अब भगवती लक्ष्मी की आराधना के लिए विशेष रूप से किया जाने वाले 16 दिवसीय व्रतानुष्ठान के दौरान लगने वाला सोरहिया का मेला इस वर्ष भी स्थगित रहेगा।
कोरोना के कारण गत वर्ष भी यह आयोजन नहीं किया गया था। लक्ष्मीकुंड स्थित महालक्ष्मी मंदिर के महंत ने कहा कि व्रतानुष्ठान की शुरुआत 13 सितंबर से होगी। महिलाएं व्रत का अनुष्ठान तो घरों में करेंगी लेकिन मंदिर परिक्षेत्र में मेला नहीं लगेगा। सोरहिया का मेला काशी के पारंपरिक मेलों में एक है। महालक्ष्मी के पूजन और व्रत का नाम सोरहिया पड़ा क्योंकि इसमें 16 के अंक का विशेष महत्व है।
इधर, संतति कामना पर्व सूर्य षष्ठी के आयोजन पर संशय के बादल मंडरा रहे हैं। कोरोना संक्रमण के कारण 12 सितंबर को षष्ठी तिथि पर होने वाले स्नान की तैयारियां अभी तक शुरू नहीं हो सकी हैं। इसके अलावा मंदिर प्रबंधन ने भी आयोजन के लिए प्रशासन के पास कोई आवेदन नहीं किया है।
लोलार्क षष्ठी के स्नान पर्व पर उमड़ती है भीड़
कोरोना संक्रमण को देख लगातार दूसरे साल लोलार्क षष्ठी के स्नान पर्व पर संशय बना हुआ है। भाद्रपद शुक्ल षष्ठी को काशी में संतति कामना का पर्व सूर्य षष्ठी मनाई जाती है। भदैनी स्थित लोलार्क कुंड में स्नान-दान, विराजमान लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन-पूजन व अनुष्ठान के विधान के कारण इसे लोलार्क षष्ठी भी कहा जाती है।
षष्ठी तिथि इस बार 12 सितंबर को मिल रही है। इस तिथि पर स्नान के लिए रेला उमड़ता है। पूर्व रात्रि से ही कतार लगती है और शाम तक विधान पूरे किए जाते हैं। कामना पूर्ति पर भी कुंड में स्नान व बच्चे का मुंडन के साथ ही लोलार्केश्वर महादेव को कड़ाही भी चढ़ाते हैं।