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Holi 2024: काशीवासी 501 साल से चौसठ्ठी देवी को चढ़ा रहे पहला गुलाल, तंत्र की देवी से करते हैं मुक्ति की कामना

Sat, 23 Mar 2024 08:51 AM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: प्रगति चंद Updated Sat, 23 Mar 2024 08:51 AM IST
सार

Holi In Varanasi: परंपराओं के निर्वहन को लेकर काशी पूरे विश्वभर में प्रसिद्ध है। यही वजह है कि 501 साल से भी अधिक प्राचीन रंगोत्सव की परंपरा होली पर निभाई जाएगी। यहां होली के पर्व पर काशी के लोग धूलिवंदन पर मां चौसठ्ठी देवी के चरणों में पहला गुलाल अर्पित करते हैं।

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Chausatthi Devi tradition of offering first gulal since 501 years in Varanasi
मां चौसठ्ठी देवी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

परंपराओं से भी प्राचीन आदियोगी शिव की नगरी काशी में अनादि काल से परंपराएं प्रवाहमान हैं। बनारस में 501 साल से भी अधिक प्राचीन रंगोत्सव की परंपरा होली पर निभाई जाएगी। दिन भर रंग खेलने के बाद काशीवासी मुट्ठी भर अबीर-गुलाल मां चौसठ्ठी देवी के चरणों में अर्पित करते हैं और तंत्र की देवी से मुक्ति की कामना करते हैं।

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बनारसी फगुआ के तार काशीपुराधिपति से जुड़े हुए हैं। बाबा विश्वनाथ के गौने पर काशीवासी बाबा और मां गौरा को गुलाल अर्पित करके होली के हुड़दंग की अनुमति लेते हैं। पांच शताब्दियों से अधिक समय से काशीवासी रंग-फाग के बाद मां चौसठ्ठी देवी को गुलाल अर्पित करके धूलिवंदन के साथ ही दरबार को जगाते हैं। दशाश्वमेध घाट के पास स्थित माता का मंदिर होली की शाम को गुलाल-अबीर के रंग में रंग जाता है।
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श्री काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि चौसट्ठी देवी के चरणों में गुलाल चढ़ाए बगैर काशी में रंगोत्सव की पूर्णता ही नहीं मानी जाती है। पुराने समय में शहर ही नहीं गांव से भी लोग चौसठ्ठी देवी को गुलाल अर्पित करने आते थे। चौसठ्ठी देवी की यात्रा गाजे-बाजे के साथ निकलती थी। बदलते समय के साथ परंपरा तो नहीं बदली, लेकिन चौसठ्ठी यात्रा अब सीमित हो चुकी है।

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चैत्र कृष्ण प्रतिपदा पर हुई थीं विराजमान

काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पं. दीपक मालवीय ने बताया कि चौसठ्ठी घाट पर देवी के मंदिर में काल भैरव व एकदंत विनायक के साथ भद्र काली के सम्मुख चौसठ्ठी देवी विराजमान हैं। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को ही चौसठ्ठी देवी ने काशी में अपना स्थान ग्रहण किया था। काशी खंड में चौंसठ योगिनियों की कथा का वर्णन मिलता है।

शिव की कृपा से पूजित हैं 64 योगिनियां
पौराणिक मान्यता के अनुसार काशी के राजा दिवोदास ने जब अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया और बाबा विश्वनाथ को भी काशी से बाहर भेज दिया। काशी नगरी में वापस आने के लिए भगवान शिव ने कैलाश से पहले अष्ट भैरव व छप्पन विनायकों को काशी भेजा। इसके बाद 64 योगिनियां काशी पहुंचीं। बाबा विश्वनाथ जब दोबारा काशी पहुंचे तो उनकी ही कृपा से चौसठ योगिनियां चौसठ्ठी देवी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। चौसट्ठी देवी सिद्धपीठ को भी तंत्र पीठ की प्रतिष्ठा प्राप्त है।

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