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चौरीचौरा कांड: महामना ने पंद्रह साल बाद पहनी थी गाउन, 140 लोगों को फांसी से कराया बरी

Thu, 04 Feb 2021 11:52 AM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Thu, 04 Feb 2021 11:52 AM IST
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Chaurichaura Kand: Mahamana wore gown after fifteen years acquitted 140 people by hangin
शहीद उद्यान वाराणसी। - फोटो : अमर उजाला

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने बीएचयू जैसे संस्थान की स्थापना के साथ ही कई ऐसे ऐतिहासिक कार्य किए हैं, जिसकी वजह से लोग उन्हें नहीं भूल पाते हैं। शिक्षा, समाजसेवा, न्यायिक सेवा लगभग हर क्षेत्रों में महामना ने लोगों का सहयोग किया है। इसमें गोरखपुर में 1922 में चौरीचौरा कांड भी शामिल हैं। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने चौरीचौरा में हुए कांड में फांसी की सजा पाने वाले 170 स्वतंत्रता ग्राम सेनानियों की न केवल लड़ाई लड़ी बल्कि हाईकोर्ट में जोरदार बहसकर इसमें से 140 लोगों को बरी भी करा दिया। यहीं नहीं चीफ जस्टिस ने उस समय हाईकोर्ट में खड़े होकर तीन बार महामना का अभिवादन किया। खास बात यह रही कि पंद्रह साल बाद महामना ने गाउन पहना था और फांसी से 140 लोगों को बरी भी कराया।

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चौरीचौरा में हुई घटना के 100 साल पूरे होने पर सरकार इसे महोत्सव के रूप में मनाने जा रही है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस आयोजन से जुड़ रहे हैं। ऐसे में चौरीचौरा कांड से जुड़ी महामना की स्मृतियों को साझा करते हुए महामना मालवीय के प्रपौत्र न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय ने बातचीत में बताया कि जब चौरीचौरा कांड को लेकर अंग्रेजी हुकूमत ने 170 लोगों को फांसी की सजा सुनाई थी।
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तब लोगों को यह चिंता सता रही थी कि आखिर इस मामले की न्यायालय में पैरवी कौन करेगा। बात वर्ष 1922 की है, जब इस घटना में फांसी की सजा सुनाए गए लोगों का मुकदमा गोरखपुर स्थित जिला कचहरी में लड़ा जाना था। न्यायमूर्ति मालवीय का कहना है कि जिला कचहरी में पता चला कि फांसी की सजा पर अपील तो हाईकोर्ट में होनी थी। यहां जब बहस की बारी आई तो कई नामी गिनामी वकीलों ने अपने हाथ खड़े कर दिए। ऐसे समय में तत्कालीन कांग्रेस वर्किंग कमेटी के लोग और मोतीलाल नेहरू ने भी महामना से मुकदमा लड़ने की अपील की थी।

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तीन बार झुककर चीफ जस्टिस ने किया था अभिवादन
महामना के प्रपौत्र गिरिधर मालवीय ने बताया कि हालांकि महामना ने पिछले पंद्रह साल से वकालत छोड़ कर गाउन न पहनने का संकल्प लिया था। वह बनारस में रहकर बीएचयू की स्थापना की तैयारी में लगे रहे। जब इन सेनानियों को फांसी की सजा सुनाने की जानकारी मिली तो महामना किसी तरह मुकदमा लड़ने को तैयार हुए। फिर तो हाईकोर्ट में ऐसी बहस हुई कि वह भी इतिहास बन गया।

तत्कालीन चीफ जस्टिस ग्रीम हुड नीर्यस ने बहस के दौरान तीन बार झुककर महामना का अभिवादन भी किया। बहस पूरी हुई तो चीफ जस्टिस ने फैसला तो सुरक्षित कर लिया लेकिन महामना से इतना जरूर कहा कि मुझे नहीं लगता है कि जितनी अच्छी बहस आपने की है, इससे अच्छी बहस हो सकती थी। जब इस बहस का फैसला आया तो उसमें से 140 लोगों को फांसी से बरी कर दिया गया।

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