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...तो भाजपा सहयोगी दलों के लिए छोड़ देगी 12 सीटें, उपचुनाव में हार के बाद पार्टी पर बढ़ा दबाव
प्रदीप मिश्र, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Tue, 03 Apr 2018 10:32 AM IST
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भाजपा
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सपा-बसपा गठबंधन के बीच गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में हार के बाद भाजपा पर केंद्र-राज्य सरकार में सहयोगी दलों का दबाव बढ़ गया है।
अपना दल (एस) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) चाह रही है कि पटेल-राजभर समुदाय के साथ-साथ पिछड़े वर्ग के एकमुश्त वोट पाने के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव में उनको पर्याप्त भागीदारी दी जाए। इसके लिए दोनों दलों ने 12 सीटें चिह्नित कर ली हैं। बात नहीं बनने पर इनमें से आधी सीटों पर दोस्ताना मुकाबला भी हो सकता है।
दोनों पार्टी के बड़े नेताओं का मानना है कि सपा-बसपा गठबंधन तो हो ही चुका है, मतदाताओं में विपक्ष के प्रति 2014 के मुकाबले नाराजगी भी घटी है। उन्हें यह भी लगता है कि ओबीसी और दलित समुदाय अगले लोकसभा चुनाव में एक पार्टी-एक व्यक्ति को ध्यान में रखते हुए मतदान नहीं करेगा।
राजनीतिक विश्लेषक भी कहते हैं कि सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस के शामिल होने पर यादव-दलित और अल्पसंख्यकों का मजबूत गठजोड़ बन सकता है। ऐसे में सहयोगी दलों की अनदेखी से भाजपा को नुकसान हो सकता है।
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2017 के विधानसभा चुनाव में अद (एस) ने पूर्वांचल की 11 सीटों पर चुनाव लड़ा और नौ पर जीत हासिल की थी, जबकि सुभासपा आठ सीटों में से चार पर विजयी रही थी। सरकार मेें भागीदारी के बाद दोनों दलों का दायरा बढ़ा है।
पूर्वांचल में खास जनाधार वाले अपना दल ने 2014 में भाजपा के साथ मिर्जापुर और प्रतापगढ़ से चुनाव लड़ा और दोनों जीतीं। पूर्वांचल में चुनौतियां कम करने के लिए ही विधानसभा चुनाव से पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने वाराणसी आकर मिर्जापुर से सांसद अनुप्रिया पटेल के साथ गठबंधन का एलान किया था।
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अपना दल (एस) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) चाह रही है कि पटेल-राजभर समुदाय के साथ-साथ पिछड़े वर्ग के एकमुश्त वोट पाने के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव में उनको पर्याप्त भागीदारी दी जाए। इसके लिए दोनों दलों ने 12 सीटें चिह्नित कर ली हैं। बात नहीं बनने पर इनमें से आधी सीटों पर दोस्ताना मुकाबला भी हो सकता है।
दोनों पार्टी के बड़े नेताओं का मानना है कि सपा-बसपा गठबंधन तो हो ही चुका है, मतदाताओं में विपक्ष के प्रति 2014 के मुकाबले नाराजगी भी घटी है। उन्हें यह भी लगता है कि ओबीसी और दलित समुदाय अगले लोकसभा चुनाव में एक पार्टी-एक व्यक्ति को ध्यान में रखते हुए मतदान नहीं करेगा।
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राजनीतिक विश्लेषक भी कहते हैं कि सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस के शामिल होने पर यादव-दलित और अल्पसंख्यकों का मजबूत गठजोड़ बन सकता है। ऐसे में सहयोगी दलों की अनदेखी से भाजपा को नुकसान हो सकता है।
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2017 के विधानसभा चुनाव में अद (एस) ने पूर्वांचल की 11 सीटों पर चुनाव लड़ा और नौ पर जीत हासिल की थी, जबकि सुभासपा आठ सीटों में से चार पर विजयी रही थी। सरकार मेें भागीदारी के बाद दोनों दलों का दायरा बढ़ा है।
पूर्वांचल में खास जनाधार वाले अपना दल ने 2014 में भाजपा के साथ मिर्जापुर और प्रतापगढ़ से चुनाव लड़ा और दोनों जीतीं। पूर्वांचल में चुनौतियां कम करने के लिए ही विधानसभा चुनाव से पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने वाराणसी आकर मिर्जापुर से सांसद अनुप्रिया पटेल के साथ गठबंधन का एलान किया था।
अपना दल (एस) यहां करेगी दावा
अनुप्रिया पटेल
- फोटो : File Photo
बदले में अनुप्रिया को केंद्र में मंत्री बनाया गया। मंत्री बनने के बाद अपना दल (एस) बनाने वाली अनुप्रिया इन दिनों ओबीसी समुदाय का भी चेहरा बन गई हैं।
प्रदेश में उनका एक राज्यमंत्री भी है। इसी तरह विधानसभा चुनाव सुभासपा के साथ लड़ने की घोषणा भी शाह ने ही मऊ में की थी। डेढ़ दशक पुरानी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री हैं। ओमप्रकाश लोकसभा चुनाव में भी गठबंधन जारी रखना चाहते हैं।
मिर्जापुर और प्रतापगढ़ सीट पार्टी के पास है। सोनभद्र से वह पूर्व सांसद पकौड़ी लाल कोल को उम्मीदवार बनाना चाहती है। फूलपुर में पटेलों की बहुतायत और उपचुनाव की हार को जीत में बदलने के लिए पार्टी यहां से दावा जताएगी।
भाजपा की कमजोर स्थिति के मद्देनजर मछलीशहर संसदीय सीट पर दावेदारी उसके एजेंडे में है। बदले में प्रतापगढ़ सीट भाजपा को दे सकती है। फतेहपुर और डुमरियागंज सीट पर भी उसकी नजर है।
सुभासपा की ओर से चिह्नित क्षेत्र
ओम प्रकाश राजभर
- फोटो : file photo
राजभर मतदाताओं को रिझाने के लिए पार्टी घोसी सीट ओमप्रकाश राजभर के बेटे अरविंद राजभर के लिए चाहती है। अरविंद बलिया के बांसडीह से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं।
अगर भाजपा की बागी केतकी सिंह चुनाव नहीं लड़तीं तो सपा की एक सीट कम हो सकती थी। बलिया की रसड़ा सीट से ओमप्रकाश की पत्नी तारामनी राजभर चुनाव लड़ चुकी हैं। बलिया, लालगंज, चंदौली और सलेमपुर के लिए भी पार्टी ने उम्मीदवार तलाश लिए हैं।
अगर भाजपा की बागी केतकी सिंह चुनाव नहीं लड़तीं तो सपा की एक सीट कम हो सकती थी। बलिया की रसड़ा सीट से ओमप्रकाश की पत्नी तारामनी राजभर चुनाव लड़ चुकी हैं। बलिया, लालगंज, चंदौली और सलेमपुर के लिए भी पार्टी ने उम्मीदवार तलाश लिए हैं।