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बाबा विश्वनाथ की नगरी में भाजपा की सबसे बड़ी जीत
अनूप ओझा, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Sun, 12 Mar 2017 06:09 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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मोदी लहर के चलते काशी में चली वोटों की सुनामी में भाजपा ने लोकतंत्र के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी जीत दर्ज की। राजनीतिक विश्लेषकों, रणनीतिकारों के तमाम पूर्वानुमान ध्वस्त हो गए। न तो कांग्रेस-सपा गठबंधन और बसपा का जोर चल पाया न जाति, धर्म, पंथ, क्षेत्रीयता के नारे काम आए।
1991 की राम लहर के बाद आई मोदी लहर ने सबको बहाकर जिले की आठों सीटों पर कब्जा कर लिया। इसमें शहर दक्षिणी को छोड़ अन्य सात सीटों पर भाजपा उम्मीदवार प्रतिद्वंद्वियों से भारी मतों के अंतर से जीते हैं।
देश के आम चुनावों से लेकर विस चुनावों तक के रिकार्ड में यह पहला मौका है जब मोक्षनगरी में भाजपा को आठ की आठों सीटें मिली हैं। पहली बार 1952 में पं. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में हुए आम चुनावों में भी कांग्रेस पांच में से चार सीटें ही जीत सकी थी।
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उस दौर में सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण सिंह ने आराजीलाइन विधान सभा सीट से कांग्रेस के ऋषिनारायण शास्त्री को पराजित किया था। 1962 में भी राजनारायण ने कांग्रेस के ऋषि नारायण को हराकर इस सीट को बरकरार रखा था।
इसी तरह चिरईगांव सीट भी कांग्रेस 52 से ही जीत रही थी लेकिन 1962 में यहां का भी रिकार्ड संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार रघुनाथ सिंह यादव ने तोड़ दिया था। 1991 की राम लहर में भी भाजपा जिले की सभी सीटें नहीं जीत पाई थी।
तब उसे छह सीटों में से पांच ही सीटें मिली थीं। गंगापुर सीट पर उसे पराजय का सामना करना पड़ा था। इस बार जिले की छह सीटों में दक्षिणी, उत्तरी, कैंट, रोहनिया, पिंडरा, शिवपुर पर भाजपा और दो सीटों में अजगरा से भाजपा-भासपा गठबंधन और सेवापुरी से भाजपा-अद (एस) गठबंधन ने चुनाव लड़ा था।
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गठबंधन की सीटों समेत सभी आठ सीटों पर विरोधी दलों के कोई जतन काम नहीं आए।
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1991 की राम लहर के बाद आई मोदी लहर ने सबको बहाकर जिले की आठों सीटों पर कब्जा कर लिया। इसमें शहर दक्षिणी को छोड़ अन्य सात सीटों पर भाजपा उम्मीदवार प्रतिद्वंद्वियों से भारी मतों के अंतर से जीते हैं।
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देश के आम चुनावों से लेकर विस चुनावों तक के रिकार्ड में यह पहला मौका है जब मोक्षनगरी में भाजपा को आठ की आठों सीटें मिली हैं। पहली बार 1952 में पं. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में हुए आम चुनावों में भी कांग्रेस पांच में से चार सीटें ही जीत सकी थी।
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उस दौर में सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण सिंह ने आराजीलाइन विधान सभा सीट से कांग्रेस के ऋषिनारायण शास्त्री को पराजित किया था। 1962 में भी राजनारायण ने कांग्रेस के ऋषि नारायण को हराकर इस सीट को बरकरार रखा था।
इसी तरह चिरईगांव सीट भी कांग्रेस 52 से ही जीत रही थी लेकिन 1962 में यहां का भी रिकार्ड संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार रघुनाथ सिंह यादव ने तोड़ दिया था। 1991 की राम लहर में भी भाजपा जिले की सभी सीटें नहीं जीत पाई थी।
तब उसे छह सीटों में से पांच ही सीटें मिली थीं। गंगापुर सीट पर उसे पराजय का सामना करना पड़ा था। इस बार जिले की छह सीटों में दक्षिणी, उत्तरी, कैंट, रोहनिया, पिंडरा, शिवपुर पर भाजपा और दो सीटों में अजगरा से भाजपा-भासपा गठबंधन और सेवापुरी से भाजपा-अद (एस) गठबंधन ने चुनाव लड़ा था।
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गठबंधन की सीटों समेत सभी आठ सीटों पर विरोधी दलों के कोई जतन काम नहीं आए।