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पितृपक्ष का कड़वा सच: पूर्वजों को दे रहे जल, लेकिन दहलीज से बेदखल हो गए जीवित बुजुर्ग; अब मोक्ष की चिंता

Sat, 10 Oct 2026 06:10 AM IST
Aman Vishwakarma अभिषेक सेठ, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अभिषेक सेठ, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Sat, 10 Oct 2026 06:10 AM IST
सार

वाराणसी में 35 बुजुर्गों ने जीते-जी मोक्ष की आस में अंतिम संस्कार के लिए पंजीकरण कराया है। पितृपक्ष में पूर्वजों को जल अर्पित करने के बीच जीवित बुजुर्गों की उपेक्षा का दर्द भी सामने आ रहा है। कई बुजुर्ग अपनों से बेदखल होकर आश्रमों में रहने को मजबूर हैं, जबकि कुछ को लावारिस हालत में सड़क पर छोड़ दिया गया।

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bitter truth Pitru Paksha Offering water ancestors evicting living elders from threshold
पितृ विसर्जन पर खास खबर। - फोटो : अमर उजाला डिजिटल

विस्तार

काशी में 30 बुजुर्ग महिलाएं ऐसी हैं, जिन्हें जीवन से अधिक मृत्यु की चिंता सता रही है। इनकी कहानी यही है कि किसी को उनके बेटे-बहुओं ने मारपीट कर घर से निकाल दिया तो किसी के पति की मौत के बाद परिवार के अन्य लोग हाल पूछने नहीं आए। इन्होंने आश्रम और अन्य सामाजिक संस्थाओं से अपने अंतिम संस्कार के लिए आग्रह किया है। 

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सारनाथ स्थित एक वृद्धाश्रम में 44 बुजुर्ग रह रहे हैं। इनमें 35 महिलाएं हैं। हर महिला की कहानी लगभग एक जैसी है, किसी को अपनों ने आश्रम में भेजा तो कोई परिस्थिति से तंग आकर आश्रम में रहने लगा। पितृपक्ष में एक ओर अपने पूर्वजों का तर्पण करने काशी आ रहे हैं, वहीं काशी में बुजुर्गों का यह हाल चिंताजनक है।

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केस 1 : जैतपुरा बागेश्वरी मंदिर के पास रहने वाली 70 वर्षीय बुजुर्ग को तीन साल पहले बेटे और बहू ने मारपीट कर घर से निकाल दिया। घर में अक्सर बहू मारपीट करती थी। करीब तीन साल पहले बहू ने इतना मारा कि वो हदस गईं और पांच दिनों तक पड़ोसी के घर में छिपी हुई थीं। बाद में उन्हें एक समाजसेवी की सहायता से आश्रम में लाया गया। महिला का कहना है कि आश्रम में उन्हें मोक्ष मिल जाएगा, अब घर नहीं जाना है।

केस 2 : पियरी की एक 55 वर्षीय महिला के पति के निधन के बाद तीन साल से आश्रम में रह रही है। बेटों ने संपत्ति बेच दी और घर से निकाल दिया। दो बेटियां हैं, जो आश्रम में कभी-कभी हालचाल लेने आती हैं। अंतिम संस्कार ठीक से हो जाए, इसलिए वह समाजसेवी की सहायता से आश्रम में आ गईं।

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केस  3 : बंगाली टोला की एक 65 वर्षीय महिला के पति के निधन के बाद उनका कोई सहारा नहीं बचा। संतान न होने के कारण देवर, जेठ और परिवार के अन्य लोगों ने घर से निकाल दिया। बताया कि उनकी एक बहन कोनिया में रहती है, जो कभी-कभी आश्रम में हालचाल लेने आती हैं। उन्होंने आश्रम के रजिस्टर में अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज करा लिया है। उनका कहना है कि अब इस दुनिया में कोई नहीं बचा है, बस अंतिम संस्कार सुखद हो जाए तो मोक्ष मिल जाए।

केस  4 : असम की 64 वर्षीय महिला चार महीने पहले बेटे संग काशी दर्शन करने आईं। बेटा चौक थाने के बाहर छोड़कर भाग गया। महिला के बेटे को कई बार फोन कर बुलाया गया लेकिन वह अभी तक अपनी मां को लेने नहीं आया।

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अंतिम संस्कार में नहीं शामिल होते परिजन
समाजसेवी अमन कबीर का कहना है कि एक साल में कई महिला और पुरुषों को सड़क पर लावारिस हालत में सारनाथ और अपना घर आश्रम में भिजवाया गया है। इनमें कई लोग ऐसे हैं जो अपने परिजनों को आश्रम से घर ले जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो परिजनाें को अपने साथ रखना ही नहीं चाहते। यहां तक कि उन्हें छोड़कर जाने के बाद न तो उनका हाल पूछते हैं और न ही उनके अंतिम संस्कार में शामिल होते हैं।

आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों की देखभाल, भोजन और चिकित्सा की पूरी व्यवस्था की जाती है, लेकिन अपनों द्वारा ठुकराए जाने की पीड़ा इनके मन में हमेशा बनी रहती है। कई बुजुर्ग ऐसे हैं जिनके गंभीर रूप से बीमार होने या निधन की स्थिति में जब उनके परिजनों से संपर्क किया जाता है, तो वे आने से साफ मना कर देते हैं या फोन उठाना बंद कर देते हैं। ऐसे में आश्रम और सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से ही पूरे विधि-विधान के साथ उनका अंतिम संस्कार कराया जाता है। - रमेश श्रीवास्तव, केयरटेकर, स्व. ज्योतिभूषण वृद्धा आश्रम।

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