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महामना के युवा मन का सपना था काशी हिंदू विश्वविद्यालय
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Fri, 08 Jul 2016 02:19 AM IST
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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
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जिस यूनिवर्सिटी की साख आज पूरी दुनिया में है। दुनिया भर के शैक्षणिक संस्थान जिसके साथ अपना नाम जोड़ने के ख्वाहिशमंद हैं, अमेरिका-जापान जैसे देशों ने जिसके साथ न जाने कितने समझौते किए, उस विश्वविद्यालय की परिकल्पना महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने इलाहाबाद के म्योर सेंट्रल कॉलेज में बीए की पढ़ाई के दौरान की थी। बीए के छात्र ने जिस बीएचयू की कल्पना की थी, आज वह 30 हजार से अधिक युवाओं की इच्छाओं-आकांक्षाओं, गौरव और सपने देखने-साकार करने का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।
महामना प्रयाग और काशी के बीच गंगा किनारे ऐसे विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते थे, जहां दुनिया भर के सभी विषयों की पढ़ाई हो। यहां के विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए विदेश न जाना पड़े, बल्कि विदेशी भारतीय संस्कृति की शिक्षा लेने यहां आएं। उन्होंने अपने मन की बात को सबसे पहले 1902 में शिमला में अपने मित्र सर सुंदरलाल और बलदेव राम दवे से साझा किया। अगले साल 1903 में उन्होंने इलाहाबाद में हिंदू बोर्ड हाउस का निर्माण करा लिया। 1904 में उन्होंने पहली सार्वजनिक बैठक तत्कालीन काशी नरेश की अध्यक्षता में बनारस में की, जिसमें विश्वविद्यालय का प्रारूप पेश किया। 1905 में उन्होंने अपनी योजना देश भर के गण्यमान्य लोगों को भेजी।
भारतीय कांग्रेस के बनारस में हुए 21वें अधिवेशन के एक दिन बाद महामना ने टाउनहॉल में विशेष बैठक की, जिसमें कांग्रेस के प्रतिनिधियों के अलावा कई विद्वान शामिल हुए। इसी बैठक में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने योजना को अपनी मंजूरी दे दी। हां, लोकमान्य ने इस दौरान महामना से जानना चाहा कि क्या वे इसके लिए अपना जीवन समर्पित करने को तैयार हैं? जवाब देने के लिए उनके पास 24 घंटे का वक्त था।
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अगले दिन महामना ने पूरे दृढ़ संकल्पित कहा, इसके लिए वह पूरी तरह से तैयार हैं। उन्हें मालूम था कि इस ‘मांझी’ की ईमानदार कोशिश रंग लाएगी, भले ही वक्त लगे। उनकी दृढ़ता देख जदुनाथ सरकार, प्रफुल्ल चंद्र रॉय, जगदीश चंद्र बोस आदि ने महामना को वचन दिया कि विश्वविद्यालय बन जाने के बाद वे सभी अपने जीवन के तीन वर्ष उस विश्वविद्यालय की सेवा में जरूर देंगे।
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महामना प्रयाग और काशी के बीच गंगा किनारे ऐसे विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते थे, जहां दुनिया भर के सभी विषयों की पढ़ाई हो। यहां के विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए विदेश न जाना पड़े, बल्कि विदेशी भारतीय संस्कृति की शिक्षा लेने यहां आएं। उन्होंने अपने मन की बात को सबसे पहले 1902 में शिमला में अपने मित्र सर सुंदरलाल और बलदेव राम दवे से साझा किया। अगले साल 1903 में उन्होंने इलाहाबाद में हिंदू बोर्ड हाउस का निर्माण करा लिया। 1904 में उन्होंने पहली सार्वजनिक बैठक तत्कालीन काशी नरेश की अध्यक्षता में बनारस में की, जिसमें विश्वविद्यालय का प्रारूप पेश किया। 1905 में उन्होंने अपनी योजना देश भर के गण्यमान्य लोगों को भेजी।
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भारतीय कांग्रेस के बनारस में हुए 21वें अधिवेशन के एक दिन बाद महामना ने टाउनहॉल में विशेष बैठक की, जिसमें कांग्रेस के प्रतिनिधियों के अलावा कई विद्वान शामिल हुए। इसी बैठक में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने योजना को अपनी मंजूरी दे दी। हां, लोकमान्य ने इस दौरान महामना से जानना चाहा कि क्या वे इसके लिए अपना जीवन समर्पित करने को तैयार हैं? जवाब देने के लिए उनके पास 24 घंटे का वक्त था।
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अगले दिन महामना ने पूरे दृढ़ संकल्पित कहा, इसके लिए वह पूरी तरह से तैयार हैं। उन्हें मालूम था कि इस ‘मांझी’ की ईमानदार कोशिश रंग लाएगी, भले ही वक्त लगे। उनकी दृढ़ता देख जदुनाथ सरकार, प्रफुल्ल चंद्र रॉय, जगदीश चंद्र बोस आदि ने महामना को वचन दिया कि विश्वविद्यालय बन जाने के बाद वे सभी अपने जीवन के तीन वर्ष उस विश्वविद्यालय की सेवा में जरूर देंगे।