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कैंपस पर बहस कराना है

Tue, 30 Jul 2019 01:42 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 30 Jul 2019 01:42 AM IST
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BHU
वाराणसी। बीएचयू कैंपस में कई अड़ियां हैं, इसमें कुछ सुबह जमतीं हैं तो कुछ शाम को। कला संकाय के सामने दिलावर की चाय की दुकान पर लगने वाली अड़ी की अपनी अलग खासियत है। यहां न केवल बीएचयू बल्कि आईआईटी, आईएमएस सहित अन्य जगहों से छात्र और शिक्षक नींबू चाय पीने के बहाने आते हैं। हालांकि चाय तो बस एक बहाना होता है, इसी बहाने यहां चर्चाएं भी खूब होती हैं। हर रोज शिक्षक-छात्र संवाद करते नजर आ जाएंगे।
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सोमवार को दोपहर के ढाई बजे यहां शिक्षकों, छात्रों की भीड़ रोजाना की तरह लगी थी। हिंदी विभाग के प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल अपने शोध छात्रों के साथ बैठे थे। यहां प्रेमचंद से लेकर तुलसी तक बहस हो रही थी। देखते देखते उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालयों की स्थिति पर चर्चा होने लगी। छात्र अनिल सूर्यधर ने बहस में कहा कि असल में उच्च शिक्षा में ज्यादातर थके हारे लोग आते हैं जिनमें पढ़ाई लिखाई से अधिक लिपिक वृत्ति हावी रहती है। जगन्नाथ दुबे ने बातचीत को आगे बढ़ते हुए कहा कि अपने पेशे व अपनी भाषा से जिस शिक्षक का लगाव कम होगा वह उतना ही कार्यालय की परिक्रमा करेगा और उतना ही पद का लोलुप होगा। शोध छात्रा रंजना गुप्ता ने इसे आत्मविश्वास की कमी बताया। कह सकते हैं कि इस अड़ी पर प्रमुख रूप से गुरु शिष्य समागम होता है जिसमें गुरुजन अपनी अकादमिक गंभीरता से मुक्त होकर ज्ञान की सहज धारा में गोते लगते हैं। यह मालवीय जी के मूल्यों व संकल्पों का परिणाम है कि एक समानांतर गुरुकुल से यहां की यह अड़ी गुलजार रहती है।
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धीरज की जुबान पर सबका नाम
कैंपस में 1960 से चल रही इस दुकान पर चाय बनाते-बनाते धीरज भी बहस करने वालों की ओर अपना कान लगाए रहता है। यहां आने वाले लोगों को उसका नाम भी याद है। धीरज के मुताबिक शिक्षकों में प्रो. श्रीसिंह, आयुर्वेद के प्रो. अजय पांडेय व त्रिपाठी जी, भौतिकी के मलिक साहब, हिंदी विभाग के प्रो. राधेश्याम राय जैसे शिक्षक यहां खाली समय में अक्सर आते हैं, जिनसे बहुत कुछ सुनने व सीखने को मिलता है।
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