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शोध: 4900 साल पहले समुद्र से यूरोप-पश्चिम एशिया तक पहुंचीं भैंसें, बीएचयू के छात्र का ऑक्सफोर्ड में रिसर्च
Sat, 07 Mar 2026 01:50 PM IST
Pragati Chand
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
Published by: Pragati Chand
Updated Sat, 07 Mar 2026 01:50 PM IST
सार
इंग्लैंड से लौटे बीएचयू के शोध छात्र शैलेश ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की लैब में प्राचीन डीएनए पर 5 महीने तक रिसर्च किया। रिसर्च में छात्र ने बताया है कि 4900 साल पहले समुद्र से यूरोप-पश्चिम एशिया तक भैंसें पहुंचीं।
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buffaloes
- फोटो : stock adobe
विस्तार
बीएचयू के शोध छात्र ने इंग्लैंड स्थित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में रिसर्च कर बताया है कि 4900 साल पहले भारत की भैंसें समुद्र के रास्ते ईरान, इराक, इटली और मिस्र तक पहुंचीं। आज पश्चिमी एशिया से लेकर यूरोप के इटली तक मिलने वाली भैंसों का मूल भारत में ही है। सिंधु घाटी और वैदिक सभ्यता के दौरान विदेशी यात्रियों को दूध देने वाली भैंसों का पता चला था।
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जंतु विज्ञान विभाग के ज्ञान लैब में शोधरत शैलेश देसाई ने पांच महीने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में शोध कर इन तथ्यों का अध्ययन किया। उन्होंने ऑक्सफोर्ड की लैब में परीक्षण किए। अब जल्द ही उनका रिसर्च पेपर भी प्रकाशित होगा। यह यात्रा बीएचयू की इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस (आईओई) योजना के तहत समर्थित थी।
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प्रसिद्ध आनुवंशिकीविद् प्रो. लार्सन के साथ किया रिसर्च
अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 तक शैलेश ने ऑक्सफोर्ड के पुरातत्व विद्यालय के आनुवंशिकीविद् प्रोफेसर ग्रेगर लार्सन की प्रयोगशाला में प्राचीन डीएनए तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए पशुपालन के इतिहास पर अध्ययन किया। शैलेश को पता चला कि पश्चिम एशिया और यूरोप की भैंसों को सबसे पहले पालतू बनाया गया। उन्होंने यह भी निष्कर्ष निकाला कि चीन और भारत में भैंसें सबसे पहले पाई जाती थीं। हालांकि रिसर्च पेपर अभी प्रकाशित नहीं हुआ है, इसलिए इस मुद्दे का पूर्ण रूप से खुलासा नहीं हुआ है लेकिन अध्ययन से पता चलता है कि भैंसों का व्यापार भारत से ईरान, इराक, इटली और मिस्र तक फैला। ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य भारतीय उपमहाद्वीप और पश्चिम एशिया के बीच लंबे समय से समुद्री संपर्कों की ओर इशारा करते हैं।
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हड्डियों, बालों और त्वचा से निकाले जेनेटिक तत्व
शैलेश ने नदी और दलदली इलाकों में रहने वाली भैंसों के जेनेटिक इतिहास की जांच की। इसमें पूर्वी एशिया की आबादी भी शामिल है। शोध में प्राचीन डीएनए अनुसंधान के लिए पुरातात्विक और ऐतिहासिक नमूनों जैसे हड्डियों, बालों और त्वचा से जेनेटिक तत्व निकाले गए। इसके लिए विशेष प्रयोगशाला सुविधाओं की आवश्यकता होती है। भैंसों के अलावा, शैलेश ने भारत में सुअर, आर्य आक्रमण मॉडल को चुनौती, और गुजराती लोगों के आनुवांशिक विश्लेषण पर भी काम किया है।