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‘गुनाहों का देवता’ को सलाम है ‘मुसाफिर कैफे’, जल्द बनने वाली है फिल्म
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Fri, 09 Jun 2017 03:00 PM IST
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दिव्य प्रकाश दुबे का नया उपन्यास मुसाफिर कैफे
- फोटो : twitter
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धर्मवीर भारती की कालजयी रचना गुनाहों का देवता को सलाम करता है दिव्य प्रकाश दुबे का नया उपन्यास मुसाफिर कैफे। करीब सात दशक से पाठकों के जहन में उथल पुथल मचाए सुधा-चंदर का किरदार बीते साल सितंबर में प्रकाशित इस उपन्यास में भी है।
बेस्ट सेलर ‘डीपी’ (दोस्तों के लिए) कहते हैं कि किरदारों को सुधा चंदर नाम देकर उन्होंने अमर उपन्यासकार से आशीर्वाद लिया है। ये भी जोड़ते हैं कि सिवाय नाम की समानता के अलावा दोनों उपन्यासों की कहानी, किरदारों की भूमिका, रिश्तों का ताना बाना बिलकुल जुदा है। जल्द ही सुधा चंदर का ये किरदार स्क्रीन पर भी नजर आने वाला है।
इंजीनियरिंग छोड़ लेखन की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुके 35 वर्षीय युवा लेखक दिव्य प्रकाश को ‘नई हिंदी’ के जरिये लोगाें में हिंदी प्रेम को एक बार फिर से जिंदा करने का श्रेय जाता है।
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नई हिंदी यानी बोलचाल वाली हिंदी जो कि एक इंजीनियर को भी हिंदी से बांध सके और आम इंसान भी हिंदी के मर्म को समझ सके। दिव्य का कहना है कि साहित्यिक हिंदी की बजाय नई हिंदी को आज युवा पसंद कर रहे हैं।
धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, राही मासूम रजा जैसे रचनाकारों ने उनके दिल पर अमिट छाप छोड़ी है। उनका सपना है कि आने वाले समय में एयरपोर्ट, ट्रेन में लोग खास तौर युवा हिंदी किताब पढ़ते दिखें। इसके लिए मां पिता को बच्चों से हिंदी का नाता उनकी दादी नानी जैसा गांठना होगा।
मुसाफिर कैफे, मसाला चाय और टर्म्स एंड कंडीशंस अप्लाई के लेखक दिव्य प्रकाश गुरुवार को बनारस में थे। पहले बनारस ननिहाल था और अब ससुराल है। मुसाफिर कैफे उनकी बेस्ट सेलिंग किताब में शामिल है। इस पर अब फिल्म भी बनने जा रही है।
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बेस्ट सेलर ‘डीपी’ (दोस्तों के लिए) कहते हैं कि किरदारों को सुधा चंदर नाम देकर उन्होंने अमर उपन्यासकार से आशीर्वाद लिया है। ये भी जोड़ते हैं कि सिवाय नाम की समानता के अलावा दोनों उपन्यासों की कहानी, किरदारों की भूमिका, रिश्तों का ताना बाना बिलकुल जुदा है। जल्द ही सुधा चंदर का ये किरदार स्क्रीन पर भी नजर आने वाला है।
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इंजीनियरिंग छोड़ लेखन की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुके 35 वर्षीय युवा लेखक दिव्य प्रकाश को ‘नई हिंदी’ के जरिये लोगाें में हिंदी प्रेम को एक बार फिर से जिंदा करने का श्रेय जाता है।
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नई हिंदी यानी बोलचाल वाली हिंदी जो कि एक इंजीनियर को भी हिंदी से बांध सके और आम इंसान भी हिंदी के मर्म को समझ सके। दिव्य का कहना है कि साहित्यिक हिंदी की बजाय नई हिंदी को आज युवा पसंद कर रहे हैं।
धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, राही मासूम रजा जैसे रचनाकारों ने उनके दिल पर अमिट छाप छोड़ी है। उनका सपना है कि आने वाले समय में एयरपोर्ट, ट्रेन में लोग खास तौर युवा हिंदी किताब पढ़ते दिखें। इसके लिए मां पिता को बच्चों से हिंदी का नाता उनकी दादी नानी जैसा गांठना होगा।
मुसाफिर कैफे, मसाला चाय और टर्म्स एंड कंडीशंस अप्लाई के लेखक दिव्य प्रकाश गुरुवार को बनारस में थे। पहले बनारस ननिहाल था और अब ससुराल है। मुसाफिर कैफे उनकी बेस्ट सेलिंग किताब में शामिल है। इस पर अब फिल्म भी बनने जा रही है।
लेखक को मिल चुका है स्टोरीबाज का टाइटल
दिव्य प्रकाश दुबे
- फोटो : twitter
कालेज के समय ही लेखन कर रहे दिव्य न जाने कितनी लघु फिल्में, कविताएं और नाटक लिख चुके हैं। टर्म्स एंड कंडीशंस अप्लाई पर ही ‘शर्तें लागू’ भी जल्द आने वाली है। चिट्ठी वाले दौर को फिर से वापस लाने के लिए ‘तुम्हारा फारुख’ नाटक लिख रहे हैं। हां, इसकी कहानियां अलग होंगी।
हिंदी के साथ दिव्य किस्सागोई में भी माहिर हैं। यही वजह है कि उन्हें स्टोरीबाज का टाइटल मिल चुका है। मूलत: गाजीपुर के रहने वाले दिव्य प्रकाश का बनारस से गहरा नाता है। ज्यादातर उनकी गर्मी की छुट्टियां बनारस में अपनी नानी के यहां बीतती।
सबसे खास बात ये कि इंजीनियरिंग को अपना कॅरियर न बनाने का फैसला भी उन्होंने बनारस में ही लिया, वो भी अस्सी घाट पर। यही नहीं उन्होंने अपने उपन्यास ‘मुसाफिर कैफे’ का अंत भी अस्सी घाट पर ही किया था। वो बात अलग थी कि बाद में इसे एडिट करना पड़ा।
हिंदी के साथ दिव्य किस्सागोई में भी माहिर हैं। यही वजह है कि उन्हें स्टोरीबाज का टाइटल मिल चुका है। मूलत: गाजीपुर के रहने वाले दिव्य प्रकाश का बनारस से गहरा नाता है। ज्यादातर उनकी गर्मी की छुट्टियां बनारस में अपनी नानी के यहां बीतती।
सबसे खास बात ये कि इंजीनियरिंग को अपना कॅरियर न बनाने का फैसला भी उन्होंने बनारस में ही लिया, वो भी अस्सी घाट पर। यही नहीं उन्होंने अपने उपन्यास ‘मुसाफिर कैफे’ का अंत भी अस्सी घाट पर ही किया था। वो बात अलग थी कि बाद में इसे एडिट करना पड़ा।