बनारस मस्त है...पर सच मानिए तकलीफ में है
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
डॉ. संपूर्णानंद जी से किसी ने कहा, चुनाव सिर पर है...आप अपने लिए वोट और समर्थन मांगने क्यों नहीं निकल रहे। ...इस पर जवाब आया कि ‘अगर मैंने पांच साल जनता का सही मायने में खयाल रखा है तो फिर समर्थन मांगने जाने की क्या जरूरत है।...और अगर फिर भी जनता हमें वोट नहीं देती तो फिर ऐसी जनता से कुछ मांगने की भी क्या जरूरत है।’ यह पूरा किस्सा राजनीति, राजनेता और जनता के बीच संबंधों का ‘सिद्धांत’ बताता है। इसमें से जो पक्ष विमुख हुआ वो राजनीति, राजनेता और जनता तो नहीं हो सकता।
11 दिन में प्रत्येक वर्ग से लगभग 250 विशिष्ट लोग मंथन में पहुंचे। मंथन को चर्चा के साथ खत्म करने के बजाए यह भी तय करना था कि यह लोग ‘जनता’ वाली भूमिका को ‘भागीदारी’ वाली कैसे बना सकते हैं। हमें उनकी चर्चा से कुछ सूत्र भी तलाशने थे, जो राजनीति को दिशा दें, राजनेता को दृष्टि और जनता को आनंदित कर सकें। बड़ी गंभीरता से पूरी भूमिका से साथ जब कुरेदा गया तो छिपाई जाने वाली घटनाएं बेधड़क कबूलनामे तक पहुंच गईं...एक पार्षद ने तो यहां तक कह दिया-‘दूसरों को क्या कहूं, मेरी पत्नी ही ऊपर खिड़की से गली में चुपचाप कूड़ा फेंक देती है।’ बस इसी की तलाश हमें भी थी..जिम्मेदारी निभानी थी...निभाई और आगे का आश्वासन है।