बनारस लिट फेस्ट: शीन काफ निजाम बोले- पहले मुशायरों में तमीज सीखने आते थे, अब तफरीह के लिए आ रहे श्रोता
Varanasi News: पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त उर्दू शायर ने अमर उजाला से बातचीत की। उन्होंने कहा कि मैं महाभारत का आशिक हूं, आरिफ नहीं, पुनर्जन्म में भरोसा है। मिर्जा गालिब ने बनारस में ही 1820 में फारसी में चराग-ए-दैर लिखा था।
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Banaras Lit Fest: बनारस लिट फेस्ट–4 में जोधपुर के मशहूर उर्दू शायर शीन काफ निजाम ने कहा कि हमने हिंदी और उर्दू दोनों में पाठक-वो श्रोता खो दिए हैं जो दशकों पहले मुशायरों में तमीज सीखने के लिए आते थे। अब के श्रोता तफरीह के लिए आ रहे हैं। शनिवार को पत्रकार प्रतीक त्रिवेदी ने होटल ताज के दरबार हॉल में पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त शीन काफ निजाम से संवाद किया।
उनके सवाल पर शायर निजाम बोले कि सवाल शाश्वत होता है और जवाब बेवफा, जो हर बार बदलता जाता है। आगे कहा कि मिर्जा गालिब ने बनारस में ही 1820 में फारसी में चराग-ए-दैर लिखा था। इसका अनुवाद प्रो. अमृतलाल इस्सर ने किया था।
काफ निजाम ने कहा, मैं महाभारत का आशिक हूं, आरिफ नहीं। आरिफ खुदा का बंदा होता है। मैं पुनर्जन्म में विश्वास रखता हूं। मैंने अपने कोर्स की किताबों के बाद सबसे पहले महाभारत में धर्म, अर्थ, कम मोक्ष के संबंध में कहा गया है कि जो इस ग्रंथ में है वही पृथ्वी पर है और जो इसमें नहीं वो धरती पर भी नहीं है। ये वाक्य बहुत प्रभावित करता है।
फिल्म नहीं इल्म के लिए बना हूं
कई बार फिल्मों में काम करने से इन्कार करने के सवाल पर उन्होंने कहा, मैं इल्म के लिए बना हूं, फिल्म के लिए नहीं। फिल्म ने बिजनेस कितने करोड़ का किया है, इसकी ही बातें होती हैं तो अब इसमें आर्ट क्यों ढूंढ रहे हो। अजीज उतना ही रखो कि दिल बहल जाए, इतना भी नहीं गला ही लील जाए।
पोस्ट ट्रूथ जमाने में सच के पीछे लगाना होता है जोर
शीन काफ निजाम ने कहा, हमारा जमाना पोस्ट ट्रूथ हो गया है, हर बार अपनी बात कहने के बाद जोर देकर कहना पड़ता है कि हां, मैं सच बोल रहा हूं। जिन रिश्तों में सबूत देने होते हैं मेरी नजर में वो रिश्ते बेहद कमजोर हैं। मैं आलिम तो नहीं हूं लेकिन आलिमो को देखा है, मैं अपनी आंखों का इसलिए शुक्रिया अदा करता हूं कि मैंने इल्म वालों को देखा है।