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August Kranti: आज ही के दिन मुंबई से मिले संदेश पर काशी में भूमिगत नेताओं ने छेड़ा था आंदोलन

Sun, 09 Aug 2020 12:32 AM IST
स्‍वाधीन तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: स्‍वाधीन तिवारी Updated Sun, 09 Aug 2020 12:32 AM IST
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august kranti special story of freedom fighter from varanasi
अगस्त क्रांति - फोटो : अमर उजाला

मुंबई में नौ अगस्त, 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पास होने के साथ ही मुंबई समेत देशभर में नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हो गई थी। काशी में इसकी भनक लगते ही डॉ. संपूर्णानंद, त्रिभुवन सिंह, रघुनाथ सिंह और कमलापति त्रिपाठी जैसे बड़े नेता भूमिगत होकर आंदोलन की रणनीति बनाने में जुट गए। इन नेताओं द्वारा हर बड़े मोहल्ले में एक-एक डिक्टेटर नियुक्त किया गया था।

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करीब सप्ताह भर तक इन नेताओं ने पुलिस को छकाया। तब तक भारत छोड़ो आंदोलन की मुहिम वाराणसी समेत पूरे पूर्वांचल में पहुंच चुकी थी। उन दिनों काशी हिंदू विश्वविद्यालय देश में छात्र राजनीति का बड़ा केंद्र था।
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राजनारायण, प्रभुनारायण सिंह जैसे छात्र नेता बीएचयू की अगुवाई करते थे। भारत छोड़ो आंदोलन की भावना को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए छात्रों की टोलियां शहर के अलावा आसपास के जिलों में भी सक्रिय हो गई।
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अन्य कॉलेज के छात्रों से संपर्क कर आंदोलन को धार दी जाने लगी थी। करीब एक पखवारे बाद छात्रों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस फोर्स बीएचयू की तरफ बढ़ी थी। 

उस समय डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन बीएचयू के कुलपति थे। बीएचयू परिसर के अंदर दाखिल होने के लिए अफसरों ने कुलपति से अनुमति मांगी। करीब चार घंटे तक फोर्स बीएचयू गेट पर खड़ी रही लेकिन डॉ. राधाकृष्णन ने पुलिस को परिसर घुसने की अनुमति नहीं दी। इससे छात्र नेता उत्साहित हो गए और धीरे-धीरे आंदोलन और तेज होता गया। 
 

august kranti special story of freedom fighter from varanasi
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
हालांकि बाद में राजनारायण और प्रभुनारायण समेत कई छात्रनेता गिरफ्तार कर लिए गए थे। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन आजाद भारत के पहले उप राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति बने थे। 

राष्ट्रीय राजीव गांधी स्टडी सर्किल के राष्ट्रीय सह समन्वयक प्रो. सतीश राय बताते हैं कि भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पं. त्रिपाठी को इलाहाबाद से गिरफ्तार कर लिया गया था। तब बीएचयू में कुलपति डॉ. राधाकृष्णन का भाषण चल रहा था।

उन्हें किसी ने पर्ची पकड़ाई तो कुलपति ने घोषणा की महात्मा गांधी गिरफ्तार हो गए हैं।  इसके बाद 10 अगस्त को बीएचयू से दशाश्वमेध तक जुलूस निकाला गया। जुलूस बढ़ता गया और कारवां जुड़ता गया। 11 अगस्त को ऐसा ही जुलूस कचहरी तक गया।

अंग्रेजों की घुड़सवार पुलिस को देख महिलाओं को आगे कर दिया गया। यहां एक 11 साल के एक लड़के ने हौसला दिखाया और डीएम कार्यालय पर लगे अंग्रेजों के झंडे को उतार कर तिरंगा फहरा दिया।

12 अगस्त को काशी विद्यापीठ को डकैतों का अड्डा बताकर ताला चढ़ा दिया गया। 13 को बीएचयू बंद हुआ। 14 और 15 को पूरे पूर्वांचल में जगह-जगह जुलूस निकाले गए। रेल की पटरियां उखाड़ दी गई। इस लड़ाई में राजनारायण, राम मनोहर लोहिया, रुस्तम सैटिन, विरेश्वर मुखर्जी आदि शामिल रहे। 
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