एशियन गेम्स : भाला फेंक में कांस्य जीतने वाले रोहित बोले- भाले पर ग्रिप नहीं बन रही थी, ट्रैक भी फिसलन भरा था
एशियन गेम्स में भाला फेंक स्पर्धा में कांस्य पदक जीतने वाले रोहित यादव का वाराणसी पहुंचने पर जोरदार स्वागत किया गया। उन्होंने अमर उजाला से बातचीत में अपनी खुशी साझा करते हुए कहा कि 13 साल का इंतजार खत्म हुआ है। अब उनकी नजर जापान में होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप पर है। रोहित ने कहा कि अगला लक्ष्य पदक का रंग बदलना है।
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13 साल के लंबे इंतजार, कड़े संघर्ष और लगातार मेहनत के बाद जौनपुर के भाला फेंक खिलाड़ी रोहित यादव की झोली में पहला अंतरराष्ट्रीय पदक आया है। जापान में हुए एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतने के बाद शुक्रवार को अपने घर लौटे रोहित ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में अपनी सफलता और संघर्ष की पूरी कहानी साझा की।
फाइनल मुकाबले में बारिश के बीच आई मुश्किलों से लेकर बांस की डंडी से शुरू हुए सफर और उस दौर तक, जब उनके करियर पर सवाल उठने लगे थे, रोहित ने हर पहलू पर बात की। उनका कहना है कि यह पदक वर्षों की मेहनत का परिणाम है। अब लक्ष्य एशियन और वर्ल्ड चैंपियनशिप में पदक का रंग बदलना और देश के लिए ओलंपिक पदक जीतना है।
पहले पदक की खुशी बयां नहीं कर सकता मेडल जीतने के बाद सबसे पहला ख्याल क्या आया? इस सवाल पर रोहित ने कहा, वर्षों की मेहनत के बाद मेरी झोली में पहला अंतरराष्ट्रीय पदक आया। खुशी को बयां नहीं कर सकता। इस पदक के लिए कितना संघर्ष किया है, यह मैं ही जानता हूं। आज से पहले मेरे पास पदक के रूप में कुछ भी नहीं था। 13 साल से इसका इंतजार कर रहा था।
यह पदक सिर्फ प्रतियोगिता में हासिल की गई एक उपलब्धि नहीं है, बल्कि उस लंबे सफर का नतीजा है जिसमें कई बार निराशा हाथ लगी। बार-बार मेहनत करने के बावजूद जब पोडियम तक पहुंचने का मौका नहीं मिला तो भी उन्होंने अभ्यास और अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा। आखिरकार एशियन गेम्स के बड़े मंच पर मेरा इंतजार खत्म हुआ।
बांस की डंडी से शुरू हुआ सफर
रोहित का भाला फेंकने का सफर किसी आधुनिक खेल सुविधा से नहीं, बल्कि बांस की डंडी से शुरू हुआ था। उनके पिता ने उन्हें भाला फेंकने की शुरुआती तकनीक सिखाई। उस समय न संसाधन थे और न ही यह भरोसा कि यह सफर इतनी दूर तक जाएगा। लेकिन पिता का भरोसा और रोहित की मेहनत धीरे-धीरे इस सफर को आगे बढ़ाती गई।
अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए रोहित कहते हैं, मैं कुछ भी नहीं भूला हूं। सब कुछ आंखों के सामने है। संघर्ष का हर पल आज रिकॉल हो रहा है। पहला दिन याद है, जब पिता जी ने बांस की डंडी से भाला फेंकना सिखाया था। धीरे-धीरे सुविधाएं बढ़ीं तो खेल निखरता गया और आज यहां पहुंचा हूं।
शुरुआती दौर में सीमित सुविधाओं के बीच अभ्यास करना उनके लिए आसान नहीं था। तकनीक सीखने और उसे बेहतर करने के लिए लगातार मेहनत करनी पड़ी। जैसे-जैसे उनका प्रदर्शन बेहतर हुआ, प्रशिक्षण की सुविधाएं भी बढ़ती गईं। लेकिन सुविधाएं मिलने के बाद भी पदक का इंतजार खत्म नहीं हुआ।
पदक दूर रहा तो उठे सवाल
रोहित के संघर्ष का सबसे कठिन दौर वह रहा, जब वह लगातार मेहनत कर रहे थे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक उनसे दूर था। प्रतियोगिताएं आती रहीं, वह तैयारी करते रहे और प्रदर्शन में सुधार भी होता रहा, लेकिन सफलता का इंतजार लंबा होता गया। एक समय ऐसा आया जब उन्हें अपने करियर को लेकर भी असमंजस होने लगा था।
खेल को लेकर परिवार को भी समाज के सवालों का सामना करना पड़ता था। उनके पिता से लोग कहते थे कि बेटे की पढ़ाई छोड़कर उसे खिलाड़ी बनाने से क्या हासिल होगा। लगातार ताने और सवाल परिवार के लिए भी आसान नहीं थे। रोहित कहते हैं, मैं जी-तोड़ मेहनत कर रहा था, मगर पदक से दूर था। एक समय ऐसा भी आया जब करियर को लेकर असमंजस में था।
पिताजी से लोग बोलते थे, क्या कर रहे हैं, बेटे की पढ़ाई छोड़कर उसे खिलाड़ी बना रहे हैं। उलाहना मिलती थी, मगर हौसला नहीं डिगा। परिवार ने हमेशा सपोर्ट किया। उन्होंने बताया कि ऐसे समय में परिवार का भरोसा ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। जब परिणाम नहीं आ रहे थे, तब भी परिवार ने उन्हें अभ्यास जारी रखने के लिए प्रेरित किया। यही वजह रही कि निराशा के दौर में भी उन्होंने खेल को नहीं छोड़ा।
बारिश ने बढ़ाई फाइनल की चुनौती
एशियन गेम्स के फाइनल में बारिश ने रोहित की मुश्किलें और बढ़ा दी थीं। गीले मौसम में भाले पर ग्रिप ठीक से नहीं बन रही थी। दौड़ते समय ट्रैक भी फिसलन भरा था और जूते के फिसलने का खतरा बना हुआ था। रोहित ने बताया, बारिश से थोड़ा सहमा हुआ था, क्योंकि जेवलीन पर ग्रिप सही से नहीं बन रही थी। ग्रिप फिसल रही थी। दौड़ने में जूता भी ट्रैक पर फिसल रहा था। हालांकि, ये दिक्कत हर खिलाड़ी के साथ थी। दौड़ते समय स्लिप करने का खतरा हमेशा बना हुआ था। सारी चुनौतियों से जूझते हुए मेडल अपने नाम किया।
अब बदलना है मेडल का रंग पहला अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने के बाद रोहित अब अगले लक्ष्य की तैयारी में जुटने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि फिलहाल इस साल थोड़ा आराम करेंगे। अगले साल एशियन चैंपियनशिप और वर्ल्ड चैंपियनशिप में पदक जीतने की कोशिश होगी। इसके बाद ओलंपिक का लक्ष्य है। रोहित ने कहा, एशियन और वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल का रंग बदलना चाहूंगा। हर खिलाड़ी की तरह मेरा भी सपना देश के लिए ओलंपिक मेडल जीतना है।
नीरज से सीखी दबाव से उबरने की कला
नीरज चोपड़ा के साथ प्रतिस्पर्धा के सवाल पर रोहित ने कहा कि नीरज उनसे काफी वरिष्ठ खिलाड़ी हैं और उनके साथ खेलना ही उनके लिए गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि नीरज के साथ ट्रेनिंग के दौरान उन्हें बड़े मुकाबलों में दबाव को संभालने की काफी सीख मिली। रोहित के मुताबिक, मैदान पर दर्शकों का शोर कितना भी हो, खिलाड़ी को खुद को शांत रखते हुए अपने प्रदर्शन पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा, नीरज बहुत सीनियर खिलाड़ी हैं। उनके पास हर पदक है। उनके साथ खेलना ही गर्व की बात है। उनसे काफी कुछ सीखने को मिला। बड़े मैचों में दबाव को कैसे कम करना है, मैदान पर प्रशंसकों के शोर के बीच खुद को कैसे शांत रखते हुए अपना सौ फीसदी देना है, यह सब उनसे साथ में ट्रेनिंग के दौरान सीखने को मिला।
घर पहुंचे, रास्ते में ढोल-नगाड़ों से स्वागत
एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतकर लौटे रोहित यादव का शुक्रवार को जौनपुर पहुंचने पर जोरदार स्वागत किया गया। दिल्ली से वाराणसी के लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, बाबतपुर पहुंचने के बाद रोहित अपने घर के लिए रवाना हुए। एयरपोर्ट से बाहर आते ही सैकड़ों समर्थक और प्रशंसक उनकी अगवानी के लिए मौजूद रहे। समर्थक रोहित को जुलूस की शक्ल में जौनपुर लेकर पहुंचे।
रास्ते में जगह-जगह लोगों ने उनका स्वागत किया। मिठाइयां बांटी गईं, ढोल-नगाड़े बजे और आतिशबाजी की गई। घर पहुंचने पर पूरे गांव के लोग उनके स्वागत के लिए जुटे रहे। परिवार के सदस्यों और ग्रामीणों से मुलाकात के दौरान रोहित ने अपनी जीत की खुशी साझा की।