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Interview: आशुतोष राणा को इस कारण बचपन से पसंद है रावण का किरदार
टीम डिजिटल,वाराणसी
Updated Thu, 28 Sep 2017 02:07 PM IST
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अमर उजाला वाराणसी कार्यालय में आशुतोष राणा
- फोटो : अमर उजाला
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फिल्मों में आमतौर पर खलनायक की पहचान रखने वाले आशुतोष राणा को रावण का किरदार पसंद है। उन्होंने रामलीला में रावण का एक्ट किया तो फिल्म रामायण एपिक में रावण के लिए आवाज दी। अमर उजाला संवाद में उन्होंने राम और रावण का अंतर बताया। ....
घाटों-गलियों के लिए मशहूर बनारस की बनावट और इसकी आध्यात्मिक महिमा की तमाम व्याख्याएं की जा चुकी हैं। आम तौर पर जहां इस शहर के बेतरतीब यातायात व्यवस्था को लेकर आलोचनाएं होती रहती हैं, वहीं फिल्म अभिनेता आशुतोष राणा की सोच इससे बिल्कुल उलट है।
उनकी नजर में इस शहर की बनावट-बसावट लोगों को अनुशासन का पाठ पढ़ाती है। वह उसके रस-रंग में डूबे नजर आते हैं। आशुतोष कहते हैं कि गलियों से गुजरते समय पता चलता है कि यहां के लोग कितने अनुशासित हैं। डेढ़ फीट की गली से तुमको भी मुझको भी निकलना है।
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गुरु, ‘तुम पहले कि हम पहले’ जैसी बात नहीं होती। उनकी नजर में काया में जहां ईश्वर वास करे, उसे काशी कहते हैं। देश में सिर्फ एक ही स्थान मणिकर्णिका है, जहां अग्नि की शुचिता के चलते मोक्ष प्राप्त होता है।
बताते हैं- ये वो धरती है जिसने मुझे आगे बढ़ने की अंतिम सीढ़ी दी। बीए फाइनल ईयर में बीएचयू के यूथ फेस्टिवल में आया तो लगा कि मुझे एनएसडी जाना चाहिए।
सौभाग्य से काशी से चाहत के मुताबिक कॅरियर की सीढ़ी मिल गई। इसी जमीन से एनएसडी में जाने का मौका मिला। इस शहर का हर कोना निराला है। काशी मेरे लिए मोक्ष का द्वार है।
इस समय काशी में तेलुगू फिल्म की शूटिंग कर रहे राणा ‘अमर उजाला संवाद’ में शामिल हुए। उन्होंने हिंदी सिनेमा से लेकर सामाजिक सरोकारों, कालजयी किरदारों के साथ-साथ राजनीति पर बेबाकी से अपनी भावनाएं साझा कीं। प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...।
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घाटों-गलियों के लिए मशहूर बनारस की बनावट और इसकी आध्यात्मिक महिमा की तमाम व्याख्याएं की जा चुकी हैं। आम तौर पर जहां इस शहर के बेतरतीब यातायात व्यवस्था को लेकर आलोचनाएं होती रहती हैं, वहीं फिल्म अभिनेता आशुतोष राणा की सोच इससे बिल्कुल उलट है।
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उनकी नजर में इस शहर की बनावट-बसावट लोगों को अनुशासन का पाठ पढ़ाती है। वह उसके रस-रंग में डूबे नजर आते हैं। आशुतोष कहते हैं कि गलियों से गुजरते समय पता चलता है कि यहां के लोग कितने अनुशासित हैं। डेढ़ फीट की गली से तुमको भी मुझको भी निकलना है।
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गुरु, ‘तुम पहले कि हम पहले’ जैसी बात नहीं होती। उनकी नजर में काया में जहां ईश्वर वास करे, उसे काशी कहते हैं। देश में सिर्फ एक ही स्थान मणिकर्णिका है, जहां अग्नि की शुचिता के चलते मोक्ष प्राप्त होता है।
बताते हैं- ये वो धरती है जिसने मुझे आगे बढ़ने की अंतिम सीढ़ी दी। बीए फाइनल ईयर में बीएचयू के यूथ फेस्टिवल में आया तो लगा कि मुझे एनएसडी जाना चाहिए।
सौभाग्य से काशी से चाहत के मुताबिक कॅरियर की सीढ़ी मिल गई। इसी जमीन से एनएसडी में जाने का मौका मिला। इस शहर का हर कोना निराला है। काशी मेरे लिए मोक्ष का द्वार है।
इस समय काशी में तेलुगू फिल्म की शूटिंग कर रहे राणा ‘अमर उजाला संवाद’ में शामिल हुए। उन्होंने हिंदी सिनेमा से लेकर सामाजिक सरोकारों, कालजयी किरदारों के साथ-साथ राजनीति पर बेबाकी से अपनी भावनाएं साझा कीं। प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...।
आशुतोष राणा से सवाल और जवाब
अमर उजाला वाराणसी कार्यालय में आशुतोष राणा
- फोटो : अमर उजाला
आपने रामलीलाओं में रावण का किरदार निभाया है। अमूमन कोई रावण कोई नहीं बनना चाहता। आपने अपने चरित्र में रावण को कैसे उतारा?
रावण है तभी राम हैं। कंस है तभी कृष्ण की महिमा है। दोनों में हां और ना का भेद है। राम ना कह देते तो रावण हो जाते। रावण हां कहना सीख जाता तो राम हो जाता। शक्ति वरण का विषय है हरण का नहीं। रावण शक्ति का हरण कर शून्य हो गया।
मेरे गांव गडरवारा (नरसिंहपुर, मध्यप्रदेश) में रामलीला बहुत ही श्रद्धा से मंचित की जाती रही है। मैं बचपन में रामलीला में अभिनय करना चाहता था। राम समेत पांच प्रमुख पात्रों के लिए ब्राह्मण होना अनिवार्य था। राम के बाद सबसे सशक्त किरदार रावण का था इसलिए मैंने रावण को चुना।
‘संघर्ष’ में लज्जा शंकर पांडेय ‘हासिल’ में गौरी शंकर पांडेय जैसे किरदार निभाए हैं। फिल्मों में शानदार शुरुआत के बाद आप रुक से गए। इसकी वजह?
मैं शुक्रगुजार हूं कि अरसा बाद लोगों को मैं नहीं मेरे किरदार याद हैं। अपने फिल्मी सफर से मैं संतुष्ट हूं। मैं कभी भी बाजार के पीछे नहीं भागा। उद्योगपति नहीं हूं, उद्यमवादी हूं। दृष्टि का होना जरूरी है। दृष्टि मिलती है तो हम दृश्यों के निर्माता हो जाते हैं। हमारे लिए अभिनय व्यापार नहीं, आत्म शोधन की प्रक्रिया है।
पहले समस्यापरक और समाधान बताने वाली फिल्में आती थीं। अब स्क्रिप्ट के ट्रेंड और फिलॉसफी बदल रही है। आप सहमत हैं?
फिल्में समाज की प्रतिबिंब अभी भी हैं। वसुधैव कुटुंबकम का भारतीय भाव अब ग्लोबल मार्केट में बदल चुका है। बाजार से परिवार निकल गया है। अब फिल्में ही नहीं, सब कुछ धन पर केंद्रित हो गया है। बाजार सभी की दिशा और दशा तय करने लगा है।
ऐसे में फिलहाल मन की बात करना कदाचित संभव नहीं है। फिर भी आश्वस्त हूं कि जब भी कोई चीज ऊंचाई पर जाती है, बरगद के पेड़ की तरह लौटकर जड़ों की ओर आती है।
बॉलीवुड से लेकर समाज तक से आपने बहुत कुछ पाया है। इसे समाज को कैसे लौटाना चाहते हैं?
मेरी सोच रही है कि समाज से जो अर्जित कर रहे हैं, उसे कितना सही ढंग से वापस कर पाते हैं। समाज विचार देता है। व्यक्ति कालातीत नहीं होता, विचार होता है। जब हम व्यक्ति को छोड़कर विचार के आग्रही होते हैं, तब अपनी संतति को विचारवान बना पाते हैं।
इसलिए समाज से मिले विचारों को परिष्कृत कर लौटाना चाहते हैं। मेरा निर्भरता में विश्वास नहीं है। खुद का सदुपयोग कर दूसरों को आत्मनिर्भर बनाना मेरा लक्ष्य है।
‘उड़नछू’ में गुदगुदाएगा ‘बिल्लू कबूतर’
आशुतोष राणा
- फोटो : अमर उजाला
बड़े परदे के खलनायक के भीतर सकारात्मक ऊर्जा के हजारों रस-रंग रचे-बसे हैं। राणा बड़े परदे जल्दी ही सिने दर्शकों को गुदगुदाते आएंगे। उनकी फिल्म ‘उड़नछू’ कुछ महीने में रिलीज होने वाली है। इस फिल्म में वह बिल्लू कबूतर उर्फ बीके भाई के रूप में नजर आएंगे। उनकी कॉमेडी फिल्म ‘चिकन करी ला’ बन कर तैयार है।