जितनी सादगी थी, उतने ही साहसी थे पंडित जी
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वैचारिक मतभिन्नता के चलते रेल मंत्री पद से इस्तीफा देकर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चौंकाने वाले पं. कमलापति त्रिपाठी ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय नजरबंदी के दौरान अपने दिल की सबसे अधिक बातें पं. लोकपति त्रिपाठी से ही साझा की थीं। जेल की कोठरी में होने के दौरान वह अपने लालजी (लोकपति) से चिट्ठियों के जरिए लगातार बातचीत करते रहे थे। नैनी जेल से ही पंडित जी ने अपने पारिवारिक और राजनीतिक जीवन से जुड़े कई रहस्यों का उद्घाटन चिट्ठियों के जरिए किया। वह अपने लालजी से इतने मित्रवत इसलिए भी थे क्योंकि उन्होंने 1934 में पत्नी से अंतिम समय वादा जो किया था।
पंडित जी लोकपति के नाम भेजी चिट्ठी में इस बात का जिक्र कर चुके हैं। 8 नवंबर, 1942 को भेजे पत्र में उन्होंने लिखा है-
प्रिय लालजी, आज से आठ वर्ष पूर्व की बात है उस समय तुम केवल आठ साल के थे। तुम्हारी माता सहसा बीमार हुईं और सिर्फ 72 घंटे में ही भौतिक जगत से विदा होने के लक्षण दीखने लगे थे। मैं सोच रहा था जीवन अपने उदर में मृत्यु का बीज लेकर क्यों आता है? तब तुम्हारी माता ने कांपते होठों से मुझसे एक सवाल किया था-बोलीं थीं- मेरे बच्चों का क्या होगा? मैंने कहा था- तुम चिंता न करो। जब तक मैं जीवित हूं तब तक तुम्हारे स्थान पर बच्चों की चौकसी करते रहना ही मेरी एकमात्र साधना होगी।
15 मार्च, 1943 को नैनी जेल से ही अपने पुत्र को भेजे एक दूसरे पत्र में उन्होंने काशी और मुंबई के जीवन की तुलना की। उस समय वह गांधी जी की अध्यक्षता में मुंबई में होने वाली सर्व भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे थे। इस पत्र में पंडित जी ने मुंबई को भोग, विलासिता से भरी लक्ष्मी की लीला वाली नगरी कहा है। उन्होंने पत्र में लिखा है कि लालजी, मैं काशी से हृदय पर बोझ लिए मुंबई पहुंचा था। वहां पहुंचते ही मेरे मन में विचित्र परिवर्तन की अनुभूति हुई। काशी में जहां भोर में ही घंट-घड़ियाल की गूंज, वेद मंत्रोच्चार की ध्वनियां गूंजती हैं, वहीं मुंबई में मोटर कार से आने-जाने वाली हजारों नारियों के चेहरे पर ऐश्वर्य, भोग की पारदर्शी लौ आंखों से सामने झलक उठती है।