लोकसभा चुनाव 2019 : पिता की विरासत पर मजबूत होगी अखिलेश की दावेदारी, आजमगढ़ सीट चुनने की ये है वजह
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सपा से पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आजमगढ़ से चुनाव मैदान में उतरने की वजह सीट को परिवार के पास रखना ही नहीं बल्कि पूर्वांचल में अपनी सियासी स्थिति और बेहतर करने का अवसर है। 2014 में वाराणसी से नरेंद्र मोदी के मुकाबले पूर्वांचल की लड़ाई को चर्चा में रखने के लिए मुलायम सिंह यादव मैनपुरी के साथ-साथ इस सीट से चुनाव लड़े थे।
मोदी लहर में मुलायम ने आजमगढ़ में जीत भी हासिल कर ली थी, पर आजमगढ़, गाजीपुर और बलिया सीट के अलावा सपा उम्मीदवारों का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। लालगंज में सपा के बेचई सरोज, बलिया में नीरज शेखर और गाजीपुर में शिवकन्या कुशवाहा ही दूसरे स्थान पर रही थी। दूसरी ओर क्षेत्र से बसपा के किसी बड़े नेता के चुनाव न लड़ने के बाद भी पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी।
घोसी से दारा सिंह चौहान, जौनपुर से सुभाष पांडे, चंदौली से अनिल मौर्य दूसरे नंबर पर रहे थे। इस चुनाव में गठबंधन के बाद अखिलेश के लिए यह इसलिए भी जरूरी हो गया है, क्योंकि इस इलाके में उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव का भी प्रभाव माना जा रहा है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अखिलेश आजमगढ़ के चुनावी मुकाबले को ही चर्चित नहीं बनाएंगे, बल्कि विधानसभा चुनाव लड़े बगैर मुख्यमंत्री बनने के समय उठे सवालों का भी जवाब दे सकेंगे।
यही नहीं, पूर्वांचल में गठबंधन खासतौर पर सपा को जो भी सीटें मिलेंगी, उनमें उनका योगदान महत्वपूर्ण हो जाएगा। वाराणसी, मिर्जापुर और आजमगढ़ मंडल की 12 सीटों में से मिज़ार्पुर, भदोही, रॉबर्ट्सगंज और मछलीशहर में भी बसपा प्रत्याशी ही दूसरे स्थान पर रहे थे। इन्हीं परिणामों के आधार पर 2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजों का आकलन किया जा रहा था। अब अखिलेश उस अवसर का लाभ ले सकते हैं।
आजमगढ़ से पूर्वांचल साधेंगे अखिलेश
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आजमगढ़ सदर से सिर्फ लोकसभा चुनाव जीतने की नहीं बल्कि पूरे पूर्वांचल को साधने की कोशिश करेंगे। पूर्वांचल में अपना गढ़ संभालने के लिए ही मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी सीट छोड़ आजमगढ़ से चुनाव लड़ा था। अब अखिलेश ने भी इसी मंशा से आजमगढ़ से उतरने का फैसला किया है।
वर्ष 2014 से पहले पूर्वांचल को सपा और बसपा का गढ़ माना जाता था। ज्यादातर सीटों पर लड़ाई सपा और बसपा के बीच सिमट कर रह गई थी। आजमगढ़ जिले की दोनों सीटों पर ही यही हालत रही हैं। आजमगढ़ सदर सीट पर एक बार रमाकांत यादव को छोड़ दें तो दोनों सीटें सपा तो कभी बसपा के कब्जे में रही हैं। 2014 में लालगंज सीट भाजपा के खाते में चली गई थी।
मऊ की घोसी का भी यही हाल रहा है। यह भी सीट बसपा और सपा के कब्जे में थी। 2014 में भाजपा के पाले में चली गई। बलिया की बात करें तो 2014 से पहले यह सीट पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और सपा में शामिल हुए उनके पुत्र नीरज शेखर के कब्जे में रही है।
2014 में यहां भी भगवा लहराया। सलेमपुर लोकसभा सीट पर कभी सपा के हरिवंश सहाय तो कभी बसपा के रमाशंकर विद्यार्थी सांसद रहे। भाजपा ने यहां भी अपना परचम लहरा दिया था। गाजीपुर, जौनपुर, अंबेडकरनगर, देवरिया, भदोही, मिर्जापुर, चंदौली, बस्ती, महराजगंज की भी स्थिति भी कुछ ऐसी ही रही है।
कई मायनों में महत्वपूर्ण है लोकसभा चुनाव 2019
2019 का लोकसभा चुनाव कई मायने में काफी महत्वपूर्ण है। वर्षों से विरोधी रहीं समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी में जहां गठबंधन हुआ है, तो वहीं प्रदेश की सत्ता से दूर होने के बाद सपा को नई संजीवनी की जरूरत है। जहां तक बसपा की बात है तो 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद से ही सत्ता से दूर होने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी पूरी तरह से साफ हो गई थी।
समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी दोनों के लिए आजमगढ़ के साथ ही पूर्वांचल के अन्य जिले उपजाऊ साबित हुए हैं। वर्ष 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में पूर्वांचल ने अखिलेश यादव को अपने सिर आंखों पर बिठाया था। इस चुनाव में सपा को जिले ने 9 विधायक दिए थे। एक सीट बसपा के पास गई थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी सपा के पांच तो बसपा के चार विधायक चुने गए।
इसके पूर्व हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव आजमगढ़ सीट से चुनाव लड़े और जीत दर्ज की। अब अखिलेश यादव ने अपने पिता की सही अर्थों में विरासत संभालने के उद्देश्य से आजमगढ़ सीट से चुनाव लड़ने का एलान किया है।
आजमगढ़ सीट से चुनाव लड़ कर वह एक साथ कई निशाने साधेंगे। पूरे पूर्वांचल में समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी गठबंधन को नई संजीवनी मिलेगी।
अमर सिंह अंकल भी चुप्पी साधेंगे
कहा जा रहा है कि यदि अखिलेश आजमगढ़ से सांसद चुन लिए गए तो उनका विरोध करने वाले उनके चाचा शिवपाल और अंकल अमर सिंह भी कुछ दिन चुप्पी साधने को मजबूर हो जाएंगे। सपा द्वारा दोबारा पार्टी से निकाले जाने के बाद अमर सिंह अखिलेश पर लगातार टिप्पणियों के साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुणगान करते रहे हैं।
पार्टी के अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए 2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश के नेतृत्व में मैदान में उतरने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा।